एक्सक्लूसिव: मंगल ग्रह पर नहीं भेजे जा सकते कट्टरपंथी, आतंकवाद से निपटने के लिए बातचीत जरूरी
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पिछले 60 साल से तिब्बत से दूर शरणार्थी के रूप में भारत में रहकर दुनिया को शांति का पैगाम देने वाले बौद्ध धर्मगुरु 14वें दलाईलामा का मानना है कि बातचीत से ही आतंकवाद से निपटा जा सकता है।
भारत में आखिरी सांस लेने की इच्छा रखने वाले दलाईलामा ने मैकलोडगंज स्थित अपने निवास पर अमर उजाला के संवाददाता सुनील चड्ढा को विशेष साक्षात्कार दिया।
आतंकवाद, तिब्बत वापसी और नए दलाईलामा के चयन समेत कई अहम मसलों पर उन्होंने एक घंटा 40 मिनट तक खुलकर बातचीत की। पेश हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश...
पुलवामा आतंकी हमले पर ये कहा
प्रश्न : पुलवामा आतंकी हमले के बाद भारत-पाकिस्तान में तनाव बढ़ा... पूरी दुनिया के लिए बड़ी समस्या बन चुके आतंकवाद को खत्म करने के लिए आपका क्या संदेश है?
उत्तर : आतंकवाद से निपटने का बेहतर तरीका बातचीत है। हाल ही में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने भी बातचीत के जरिये शांति का मार्ग अपनाने की बात कही। अमेरिका भी अफगानिस्तान सहित कई क्षेत्रों में कट्टरपंथियों को खत्म नहीं कर सका। कट्टरपंथी मंगल ग्रह पर ही भेज दिए जाएं, यह तो हो नहीं सकता। इस धरती पर सबको मिलकर रहना है। आतंकी भी बचपन में सामान्य नागरिक थे। जब उन्हें गलत शिक्षा देकर भेदभाव का पाठ पढ़ाया जाता है तभी वे भटकते हैं। इस सदी को डायलॉग ऑफ सेंचुरी का नाम दिया जाना चाहिए।
दलाईलामा पदवी स्थापित रहेगी या नहीं?
प्रश्न : दलाईलामा पदवी स्थापित रहेगी या नहीं? होगी तो अगले दलाईलामा कब चुने जाएंगे और वह कौन होंगे?
उत्तर : अगला दलाईलामा होगा या नहीं, यह तिब्बत की जनता को तय करना है। दलाईलामा पदवी के भविष्य को लेकर इस साल विचार-विमर्श किया जाएगा। इसके लिए निर्वासित तिब्बत सरकार और उच्च लामाओं की टीमें इस वर्ष बैठकें करेंगी। मुझे लगता है कि वे दलाईलामा संस्थान को आगे बढ़ाने का निर्णय लेंगे, लेकिन यह मेरा विषय नहीं है। बौद्ध भिक्षु होने के नाते मेरी रोजमर्रा की जिंदगी लोगों के लिए समर्पित होनी चाहिए।
प्रश्न : निर्वासन के 60 बरस बीत गए... क्या कभी तिब्बत वापस जा पाएंगे?
उत्तर : चीन के लाखों लोग बौद्ध धर्म अपना चुके हैं। जब भी उन्हें मेरे पास आने का मौका मिलता है, मैं उन्हें टीचिंग देता हूं। भारत का पुरातन ज्ञान चीन में भी फैलाना चाहता हूं, लेकिन चीन में वही सिस्टम है जो मेरे वहां रहते व्याप्त था। चीन में आज भी हालात नाजुक हैं। मैं तिब्बत जाने को उत्सुक हूं। वहां एक या दो हफ्ते रहना चाहता हूं। चीन का भोजन खाना चाहता हूं।
तिब्बत मसले पर चीन सरकार से वर्तमान में कोई बातचीत?
प्रश्न : तिब्बत मसले पर चीन सरकार से वर्तमान में कोई बातचीत?
उत्तर : साल 2002 के बाद चीन सरकार से कोई औपचारिक वार्ता नहीं हुई। अनौपचारिक तौर पर कुछ उच्चाधिकारियों से मेरी बातचीत चल रही है। निजी तौर पर मुझसे चीन के कुछ सेवानिवृत्त अधिकारी और व्यापारी मिलने आते रहते हैं। जब से मैंने तिब्बत की स्वतंत्रता की मांग त्यागी है, तब से चीन के नेता चाह रहे हैं कि दलाईलामा को वापस लाया जाए।
प्रश्न : चीन के दबाव में विश्व के कई नेता आपसे नहीं मिलते...बुरा नहीं लगता?
उत्तर : नेताओं से मिलना मेरे लिए इतना महत्वपूर्ण नहीं। मेरे लिए जनता महत्वपूर्ण है। शांति की स्थापना ही मेरा उद्देश्य है।
अगर आपको भारत नहीं आना पड़ता और तिब्बत में ही रहते तो क्या बदलाव पाते?
प्रश्न : अगर आपको भारत नहीं आना पड़ता और तिब्बत में ही रहते तो क्या बदलाव पाते?
उत्तर : भारत में आकर मुझे कई बुद्धिजीवियों से मिलने का मौका मिला। मैं खुश हूं कि मैं आज भारत में हूं। अगर आज भी मैं लहासा में होता तो रूढ़िवादी लामा होता। मुझे लगता है कि 14वां दलाईलामा बहुत मॉर्डन दलाईलामा है।
10 वर्ष और जीऊंगा, भारत में आखिरी सांस लेना मेरी इच्छा
दलाईलामा ने कहा कि दुनिया में 7 अरब लोगों की सलामती, धार्मिक सद्भाव बढ़ाना, तिब्बत का पर्यावरण और संस्कृति बचाना, दुनिया में करुणा और अहिंसा फैलाना मेरी प्रतिबद्धताएं हैं। भारत में ही आखिरी सांस लेना मेरी इच्छा है। अगले 10 साल और जीऊंगा और कोशिश करूंगा कि पुरातन शिक्षा पद्धति को दुनिया में प्रसारित किया जा सके।