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जब वाजपेयी बोले- कहीं यह आवाज मेरे परम मित्र टशी की तो नहीं

Fri, 17 Aug 2018 10:20 AM IST
शशिभूषण पुरोहित, अमर उजाला, ऊना
शशिभूषण पुरोहित, अमर उजाला, ऊना Updated Fri, 17 Aug 2018 10:20 AM IST
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atal bihari vajpayee and tashi dawa friendships like Krishna and Sudama

एक लंबे अरसे के बावजूद जब टशी दावा अटल बिहारी वाजपेयी से नई दिल्ली स्थित उनके निवास स्थान में मिले तो एकाएक वाजपेयी टशी को शक्ल से पहचान नहीं पाए। उन्होंने कहा कि उन्हें आभास हो रहा है कहीं यह आवाज उनके नाटे कद वाले कबायली परम मित्र टशी दावा की तो नहीं।

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ऐसे में जब उन्हें बताया गया कि उनसे मुलाकात करने आया व्यक्ति टशी दावा ही है तो वाजपेयी ने न केवल टशी दावा को गले से लगा लिया बल्कि उस लंबे अर्से को याद कर वह भावुक भी हो गए। यह दोस्ती बिलकुल कृष्ण और सुदामा की मित्रता जैसी थी।
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एक ओर कहां देश के प्रधानमंत्री पद पर बैठा व्यक्ति और दूसरी ओर एक जनजातीय जिला से संबंध रखने वाला आम नागरिक। इस बीच वाजपेयी ने न केवल उनका कुशलक्षेम पूछा बल्कि उनके यहां आने का कारण भी जाना।
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कबायली जिला लाहौल-स्पीति के निवासी टशी दावा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को लाहौल वासियों को लगभग छह माह तक बर्फ की कैद से छुटकारा दिलाने के लिए रोहतांग सुरंग बनाने की मांग रखी। इस पर वाजपेयी ने उन्हें इस टनल को सामरिक दृष्टि से भी अति महत्वपूर्ण मानते हुए इसके निर्माण की हामी भरी। 

टशी दावा वाजपेयी की दोस्ती से संबंधित कई बातें साझा की

atal bihari vajpayee and tashi dawa friendships like Krishna and Sudama

ऊना में पिछले दिनों कार्यकारी जिला लोकसंपर्क अधिकारी के पद पर सेवारत रहे स्वर्गीय टशी दावा उर्फ अर्जुन गोपाल के पुत्र रामदेव कपूर ने अपने पिता एवं पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की दोस्ती से संबंधित कई बातें साझा की।

उन्होंने बताया कि उनके पिता टशी दावा देश के सबसे पुराने गैर राजनीतिक संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के सक्रिय कार्यकर्ता थे। इसी बीच वर्ष 1942 को आरएसएस के एक प्रशिक्षण शिविर के दौरान उनकी पहली मुलाकात गुजरात के बडोदरा में अटल बिहारी वाजपेयी के साथ हुई थी।

इस दौरान टशी दावा और वाजपेयी के बीच एक घनिष्ठ दोस्ती कायम हुई। लेकिन लंबे अर्से तक इन दोनों की मुलाकात जीवन की आपाधापी एवं व्यस्तता के कारण नहीं हो पाई।

लेकिन इस दौरान टशी दावा के मन में न केवल लाहौल वासियों की समस्या हर वक्त उन्हें परेशान करती रहती थी, बल्कि इस क्षेत्र को बर्फ की कैद से छुटकारा दिलाने के लिए वे हमेशा चिंतित रहते थे।

इसी बीच उनके मन में लाहौल व मनाली के बीच एक सुरंग निर्मित करने का विचार आया ताकि यह क्षेत्र देश व दुनिया के साथ लगातार जुड़ा रह सके। इसी विचार को लेकर टशी दावा लगभग 56 वर्ष के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिलने दिल्ली पहुंचे। 

अटल ने केलांग में की थी सुरंग की घोषणा 

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खास बात यह है कि सामरिक दृष्टि से अति महत्वपूर्ण रोहतांग टनल लाहौल निवासी टशी दावा उर्फ अर्जुन गोपाल तथा देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की दोस्ती का प्रतीक बनकर हमारे सामने आई है।

इसी दोस्ती के कारण आज न केवल लाहौल वासियों की किस्मत बदलने वाली है बल्कि वर्ष में छह माह तक बर्फ की कैद में जीवन व्यतीत करने वाले लाहौल के लोगों को अब जल्द ही बर्फ की कैद से आजादी भी मिलने वाली है। 

तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी तीन जून, 2000 को अपने हिमाचल दौरे के दौरान लाहौल के मुख्यालय केलांग में पहुंचे तो अपने परम मित्र टशी दावा की उपस्थिति में आयोजित एक जनसभा में उन्होंने रोहतांग सुरंग के निर्माण की घोषणा की थी।

टशी के पुत्र रामदेव कपूर कहते हैं कि दोस्ती निभाना कोई अटल जी से सीखे। अटल जी जब भी मनाली स्थित अपनी निवास प्रीणी आते थे तो पिता जी को फोन करना नहीं भूलते थे।

दो दिसंबर, 2007 को टशी दावा ने लगभग 83 वर्ष की उम्र में उसी जगह रोहतांग दर्रा पार करते समय अपने प्राण त्याग दिए, जिस समस्या से लाहौल वासियों को छुटकारा दिलवाने के लिए वे लगातार संघर्ष कर रहे थे।

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