#हिंदीहैंहम: धनाढ्य वर्ग के व्यवहार की भाषा भी बने हिंदी
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हिंदी भाषा ने पूरे देश को एक सूत्र में पिरोकर रखा है। यह किसी क्षेत्र या धर्म विशेष की भाषा नहीं है। राष्ट्रभाषा होने के बावजूद हिंदी को अभी भी तमाम वर्गों को दिल से अपनाने की जरूरत है। यह धनाढ्य वर्ग के व्यवहार की भी भाषा होनी चाहिए। यह उद्गार हिमाचल के बुद्धिजीवियों ने व्यक्त किए। अवसर था अमर उजाला के हिंदी हैं हम अभियान के तहत शिमला कार्यालय से आयोजित किए गए वेबिनार का। इसका हिस्सा बने साहित्यकारों और हिंदी सेवियों ने अमर उजाला के इस अभियान की सराहना की और खुलकर अपने विचार रखे। पेश हैं इसके कुछ अंश :
दक्षिण और पूर्वी भारतीय भाषाओं से शब्द ग्रहण करने की जरूरत : दिनेश शर्मा
कवि और समाज शास्त्र के सहायक प्रोफेसर दिनेश शर्मा का कहना है कि हिंदी को भी शुद्धतावादी होने के बजाय समावेशी होकर दक्षिण और पूर्वी भारत की अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण कर उदारवादी व प्रगतिशील होने की आवश्यकता है। इसे व्यापार, वाणिज्य, विज्ञान व तकनीक की भाषा बनना होगा।
शासन, रोजगार और न्याय की भाषा बने हिंदी : आत्मा रंजन
संपर्क और साहित्य की दृष्टि से हिंदी अपेक्षित रफ्तार से आगे बढ़ रही है, लेकिन शासन, न्याय, रोजगार की भाषा फिलहाल नहीं बन पा रही है। हिंदी विरोध के सांस्कृतिक पहलुओं को भी संवेदनशीलता से समझने की जरूरत है। हमारे नीति नियंताओं को भावुकतापूर्ण बातों के बजाय कुछ व्यावहारिक और ठोस नीतिगत निर्णयों पर बढ़ना चाहिए।
हिंदी हमारी रोने-हंसने, खाने- पीने, सोचने-विचारने की भाषा : स्नेही
साहित्यकार और हिंदी के सहायक प्रोफेसर सत्यनारायण स्नेही ने कहा कि हिंदी हमारी रोने-हंसने, खाने- पीने, सोचने-विचारने तथा सपनों की भाषा है। इस देश में इसकी किसी अन्य भाषा से तुलना करना या कमतर या श्रेष्ठता सिद्ध करना बेमानी है, क्योंकि भारत का अस्तित्व और पहचान हिंदी से है, जो निर्विवाद है।
दक्षिण, पूर्व और उत्तर भारत के बीच में बांटना सही नहीं : अश्विनी शर्मा
गुड़िया पुस्तक के लेखक अश्विनी शर्मा ने कहा कि हिंदी किसी धर्म विशेष की भाषा नहीं है, यह राष्ट्रभाषा है। इसे दक्षिण, पूर्व और उत्तर भारत के बीच में बांटना सही नहीं है। सरकारी विभागों जैसे राजस्व, पुलिस विभागों और कोर्ट में उर्दू तथा अंग्रेजी के बजाय सरल हिंदी का इस्तेमाल होना चाहिए।
हिंदी से हो सकता है राष्ट्र और विश्व का नेतृत्व : नवनीत भावटा
हिंदी के सहायक प्रोफेसर नवनीत भावटा ने कहा कि मनुष्य के पास अपनी वाणी को व्यक्त करने का माध्यम भाषा है। उस भाषा में हिंदी हमारे सामने है। ज्ञान तो किसी भी भाषा में मिल सकता है, लेकिन मौलिक ज्ञान जिसके कारण किसी राष्ट्र और विश्व का नेतृत्व कर सकते हैं, वह हमारी भाषा हिंदी है।
देश में सबसे ज्यादा बोले और समझे जाने वाली भाषा है हिंदी : केआर भारती
सेवानिवृत्त भारतीय प्रशासनिक सेवाएं अधिकारी और हिंदी-अंग्रेजी दोनों भाषाओं के लेखक केआर भारती ने कहा कि हालांकि हिंदी आधिकारिक तौर पर राष्ट्रीय भाषा घोषित नहीं हो सकी है, मगर सबसे ज्यादा बोली जाने वाली और समझी जाने वाली भाषा हमारे देश में हिंदी ही है। इसमें बहुत हद तक बोलचाल की भाषा और संपर्क भाषा के रूप में अपने आप को स्थापित कर भी लिया है।
हिंदी माध्यम में स्तरीय पुस्तकों का उपलब्ध होना जरूरी : पंत
साहित्यकार कुलराजीव पंत ने कहा कि हिंदी माध्यम को हमने अपनाना है तो हिंदी माध्यम में स्तरीय पुस्तकों का उपलब्ध होना जरूरी है। उनके उचित दाम हों और आसानी से शिक्षकों और विद्यार्थियों को उपलब्ध होनी चाहिए। हिंदी पट्टी की साहित्य अकादमियों के स्तरीय प्रकाशन हिंदी भाषा में हैं, पर वे पुस्तक मेलों में कभी-कभार ही देखने को मिलते हैं। ये आम जनता तक पहुंच नहीं पाते हैं।
हिंदी के बारे में गलत तर्क दिए जाते रहे : डॉ. देवकन्या
फिल्मकार डॉ. देवकन्या ठाकुर ने कहा कि जब राजभाषा अधिनियम 1963 आया तो कहा गया कि हिंदी को राष्ट्रभाषा नहीं बनाया जा सकता है। अंग्रेजी के 65 हजार मूल शब्द हैं। यह गलत तर्क दिया गया, जबकि हिंदी के आठ लाख और संस्कृत के साठ लाख शब्द हैं। विज्ञान, तकनीकी आदि की भाषा अंग्रेजी बताई गई। जबकि ज्यादातर विज्ञान तो रूसी भाषा में लिखा गया है। रूसी और जापानी में बड़े अखबार हैं। दुनिया में सबसे ज्यादा आबादी द्वारा बोली जाने वाली भाषा चीनी है, उसके बाद हिंदी है।
हिंदी से ही मिट सकता है हिय का सूल : राजेंद्र वशैइक
वेदाचार्य, संस्कृत व्याकरण ज्ञाता राजेंद्र वशैइक का कहना है कि हिय का शूल हिंदी ही मिट सकता है। निजी भाषा से ही उन्नति मिल सकती है। भारतेंदु हरीशचंद्र का यह कथन हिंदी के बारे में सर्वथा विचारणीय है। हिंदी हमारे आचार-व्यवहार की भाषा है। इसकी उत्पत्ति हमारी प्राचीन, वैदिक भाषा संस्कृत से हुई है। अमर उजाला का हिंदी हैं हम अभियान प्रशंसनीय है।
धनाढ्य वर्ग को व्यवहार में स्वीकार करनी होगी हिंदी : मुंशी शर्मा
साहित्यकार मुंशी शर्मा ने कहा कि हिंदी की इतनी बुरी गति भी नहीं है, जितना हिंदी के कई विद्वानों को लगता है। भारत के एक छोटे से भूभाग से इसका प्रादुर्भाव हुआ है। इसने भारत जैसे विशाल और विविधता भरे देश में स्वीकार्यता पा ली है। धनाढ्य वर्ग को भी इस भाषा की व्यवहार में स्वीकार करने की जरूरत है।
हिंदी सीखना और सिखाना समाज और परिवार का दायित्व : वीरेंद्र सिंह
क्षेत्रीय केंद्र धर्मशाला में हिंदी के सहायक प्रोफेसर वीरेंद्र सिंह ने कहा कि हिंदी सिर्फ एक भाषा नहीं, यह संस्कृति को साथ लेकर आती है। वर्तमान शिक्षा व नवीन शिक्षा नीति हिंदी के संरक्षण और संवर्द्धन के लिए अनुकूल है, लेकिन हिंदी सीखना और सिखाना केवल औपचारिक शिक्षा की जिम्मेवारी नहीं, बल्कि समाज और परिवार का दायित्व भी है।