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Shimla News: दुर्घटना में मौत का प्रमाणपत्र देने को प्रधान अधिकृत नहीं

Fri, 03 Jan 2025 11:59 PM IST
Shimla Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Fri, 03 Jan 2025 11:59 PM IST
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Accidental death certificate 
Principal not authorized to give
राज्य उपभोक्ता अदालत ने पलटा जिला आयोग का फैसला
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बीमित व्यक्ति की बाथरूम में गिरने से हुई थी मौत

संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। हिमाचल राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने पांच साल पुराने मामले में चंबा उपभोक्ता आयोग द्वारा हरियाणा की केयर हेल्थ इंश्योरेंस लिमिटेड (पूर्व में रेलिगेयर हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी था नाम) के खिलाफ पारित विवादित फैसले को रद्द कर दिया है।

राज्य आयोग के अध्यक्ष एवं न्यायमूर्ति इंदर सिंह मेहता ने अपील का निपटारा करते हुए यह आदेश पारित किया है कि शिकायतकर्ता का हलफनामा कि उसके पिता बीमाधारक नारायण सिंह की मौत गिरकर सिर में चोट लगने से हुई है, मृत्यु के तथ्य को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसलिए ठोस और विश्वसनीय सबूत यानी मेडिको लीगल प्रमाण पत्र और पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अभाव में पंचायत के प्रधान द्वारा जारी प्रमाण पत्र महत्वहीन है। यह मामला साल 2019 में चंबा जिला उपभोक्ता आयोग का है। शिकायतकर्ता विरेंद्र कुमार के पिता नारायण सिंह ने अपनी जमीन जायदाद के एवज में केसीसी योजना के तहत 5 लाख रुपये लिए थे। हिमाचल प्रदेश ग्रामीण बैंक ने योजना के अनुसार रेलिगेयर, स्वास्थ्य बीमा कंपनी से नारायण सिंह के नाम से स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी भी करवाई थी। 6 अक्तूबर 2019 को नारायण सिंह की बाथरूम में अचानक गिरने से मौत हो गई थी। मृत्यु के बाद शिकायतकर्ता ने उचित मुआवजे के लिए विपक्षी पक्ष को सभी दस्तावेज प्रस्तुत किए, लेकिन दावे को खारिज कर दिया गया। इससे परेशान होकर उपभोक्ता ने विपक्षी पक्षों के खिलाफ जिला उपभोक्ता आयोग में शिकायत दी थी। आयोग ने जांच में संबंधित पंचायत प्रधान के एकमात्र हलफनामा रिपोर्ट के आधार पर शिकायतकर्ता को उचित मुआवजा देने का फैसला सुनाया था। अब राज्य उपभोक्ता आयोग ने बीमा कंपनी की अपील को स्वीकार करते हुए 20 दिसंबर, 2023 को चंबा आयोग द्वारा पारित फैसले को रद्द कर दिया।
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चंबा आयोग ने 10 लाख का मुआवजा देने के दिए थे आदेश
20 दिसंबर 2023 को चंबा आयोग ने तत्कालीन रेलिगेयर हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी को शिकायतकर्ता को 10 लाख की राशि नौ प्रतिशत प्रति वर्ष की ब्याज दर के साथ के अलावा मुआवजा और मुकदमेबाजी खर्च के रूप में 20 हजार रुपये देने का फैसला सुनाया था। इसके बाद, विपक्षी पक्ष ने जिला आयोग के आदेश के खिलाफ राज्य उपभोक्ता आयोग के समक्ष अपील दायर की थी।
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