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अफसर सीएम की नहीं सुनते, हमारी कौन सुनेगा

Fri, 28 Jul 2017 09:50 PM IST
Updated Fri, 28 Jul 2017 09:50 PM IST
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अफसर सीएम की नहीं सुनते, हमारी कौन सुनेगा
अमर उजाला ब्यूरो
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शिमला। ग्रामीण क्षेत्रों के अस्पतालों में खाली पदों को लेकर जिला परिषद की बैठक में तीखी बहस हुई। आनंदपुर वार्ड सदस्य मदन मोहन ने कहा कि जुन्गा अस्पताल एक डॉक्टर के सहारे चल रहा है। सीएम कुछ दिन पहले यहां खुद आए थे। 24 घंटे में सारे पद भरने आदेश दिए। सीएमओ, बीएमओ समेत स्वास्थ्य महकमे के अफसर भी वहीं थे। इन्होंने उस समय हामी भरी मगर पद आज तक नहीं भरे गए। सदस्य ने कहा कि जब अफसर सीएम साहब के ऑर्डर नहीं मानते तो हम तो चीज ही क्या हैं। अस्पताल में न एक्सरे होते हैं न ही कोई टेस्ट। सदस्य दलीप कायथ ने खनेरी अस्पताल रीना ठाकुर ने कोटगढ़ तो इंदू वर्मा ने ठियोग अस्पताल का मामला उठाया। पूछा कि आखिर कब खाली पद भरे जाएंगे। इस पर सीएमओ ने कहा कि जुन्गा के लिए एक और डॉक्टर के ऑर्डर हो गए हैं। बैठक में पंचायतों के तहत बने एंबुलेंस रोड पर भी चर्चा हुई। जिप सदस्य वंदना ने कहा कि जो सड़कें पंचायतों के तहत बनी हैं वे पास नहीं हो रहीं। इससे गांवों में एंबुलेंस सुविधा नहीं मिल पाती। इन रोड पर कोई हादसा भी हो तो पास न होने से क्लेम नहीं मिलता। तय हुआ कि ये रोड पीडब्ल्यूडी के नियमों के तहत बनाए जाएंगे जबकि रोड पास करने संबंधी मामला सरकार को भेजा जाएगा।
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जिप को मिला बजट, सदस्यों से मांगें प्रस्ताव
सरकार ने जिला परिषद को 4 करोड़ 22 लाख का बजट जारी कर दिया है। जिप अध्यक्ष धर्मिला हरनोट ने सभी सदस्यों को अपने अपने वार्ड के विकासकार्यों के प्रस्ताव तैयार करने को कहा। ये पैसा सामुदायिक भवन, महिला मंडल, युवक मंडल, मंदिर, पानी, सड़क निर्माण, खेल, फुट ब्रिज, चिल्ड्रन पार्क, पंचायत घर और पार्किंग जैसे कामों पर खर्च करना होगा।
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मंत्री के कहने पर भी नहीं लिख रहे सस्ती दवाइयां
शिमला। सदस्य दलीप कायथ ने रामपुर अस्पताल में मरीजों को महंगी दवाएं लिखने का मामला उठाया। कहा कि मंत्री कौल सिंह ठाकुर के कहने के बावजूद अस्पताल में मरीजों को ब्रांडेड दवाएं खरीदने को मजबूर किया जा रहा है। इसमें केमिस्ट से मिलीभगत हो रही है। सीएमओ ने कहा कि लिखित शिकायत नहीं मिली है। इसकी जांच की जाएगी।
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डस्टबिन जांच के आदेश
पंचायती राज विभाग के तहत पंचायतों में बने डस्टबिन के निर्माण में गड़बड़ी की जांच होगी। सदस्य नीलम सरैक ने कहा कि कई जगह डस्टबीन एक लाख तो कहीं 15 हजार में बनाए गए हैं। इसकी जांच होनी चाहिए कि आखिर इन्हें बनाने की क्या गाइडलाइन थी और पूरा पैसा इन पर इस्तेमाल हुआ भी या नहीं।
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