आज ही के दिन कसौली से भड़की थी 1857 के विद्रोह की चिंगारी
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हिमाचल में पहली क्रांति की चिंगारी कसौली से भड़की थी। आज से 159 वर्ष पहले यानी 20 अप्रैल 1857 को अंग्रेजों से भारत को आजाद करवाने के लिए हिमाचली जवानों ने भी अपने जीवन का बलिदान दिया था।
20 अप्रैल 1857 को अंबाला राइफल डिपो के छह भारतीय सैनिकों ने कसौली थाने को जलाकर राख कर दिया था। अंग्रेजों के सुरक्षित गढ़ कही जाने वाली कसौली छावनी में भारतीय सैनिकों द्वारा सेंध लगाए जाने से गोरे अधिकारी बौखला गए थे।
परिणामस्वरूप उन्होंने कई क्रांतिवीरों को पकड़कर जेलों में ठूंस दिया और कइयों को फांसी पर चढ़ा दिया था। कसौली से इतनी बड़ी आजादी की लड़ाई लड़ी गई। लेकिन दु:ख का विषय है की कसौली की क्रांति के इतिहास को बहुत ही कम लोग जानते हैं और युवा पीढ़ी को तो इस क्रांति और शहीद हुए क्रांतिवीरों के बारे में कुछ भी पता नहीं।
भारतीय सेना ने नहीं माने थे निर्देश
कसौली में क्रांति की ज्वाला से भड़की चिंगारी ने पूरे हिमाचल को अपने आगोश में लेकर लोगों के मनों में आजादी की अलख जगा दी थी। कसौली के बाद डगशाई, सुबाथू, कालका और जतोग छावनियों समेत पूरे हिमाचल में क्रांति की लहर फैल गई।
अंग्रेजों ने मेरठ, दिल्ली और अंबाला में भी विद्रोह की सूचना मिलते ही कसौली छावनी के सैनिकों को अंबाला कूच करने के आदेश दिए, जिसे भारतीय सैनिकों ने नहीं माना और खुले तौर पर विद्रोह करके बंदूकें उठा लीं। कसौली की नसीरी बटालियन (गोरखा रेजिमेंट) ने भी ब्रिटिश अधिकारियों के अंबाला कूच करने के निर्देश नहीं माना और खुलेआम बगावत कर ली।
कसौली ट्रेजरी को भी लूटा
कसौली में नसीरी बटालियन (गोरखा रेजीमेंट) हुआ करती थी। इसके सूबेदार भीम सिंह बहादुर थे। 13 मई 1857 को सैनिकों ने अंग्रेजों पर हमला कर उन्हें धूल चटा दी थी और कसौली ट्रेजरी में रखे चालीस हजार की राशि लूट ली थी। अंग्रेजों के तत्कालीन कमिश्नर पी. मैक्सवैल ने अपनी डायरी में लिखा था कि यह हैरत की बात है कि मुट्ठीभर क्रांतिकारियों ने अपने से चार गुना अधिक अंग्रेजी सेना को हरा दिया था।
गौरतलब है कि सिर्फ 45 क्रांतिकारियों ने 200 अंग्रेजों को धूल चटा दी थी। कोष लूटने के बाद नसीरी सेना जतोग कूच कर गई। इसके बाद विद्रोह की डोर स्थानीय पुलिस ने अपने हाथों में ले ली। तत्कालीन दरोगा बुध सिंह ने अंग्रेजों को काफी आतंकित किया, लेकिन वे पकडे़ गए उन्होंने गोरों के हाथों मरने से भला स्वयं को गोली मारकर शहीद कर लिया।
पंडित रामप्रसाद वैरागी को दी फांसी
पूरे देश में क्रांति के संचालन के लिए एक गुप्त संगठन बनाया गया था। पहाड़ों में इसके नेता पंडित राम प्रसाद वैरागी थे। वह सुबाथू मंदिर में पुजारी थे। संगठन पूरे देश में पत्रों के माध्यम से क्रांति का संचालन करता था। 12 जून 1857 को इस संगठन के कुछ पत्र अंबाला के कमिश्नर जीसी बार्नस के हाथ लगे। इसमें दो पत्र राम प्रसाद वैरागी के भी थे।
इससे संगठन का भेद खुल गया और वैरागी को पकड़कर अंबाला जेल में फांसी पर चढ़ा दिया। हालांकि क्रांतिकारियों को सहयोग न मिलने के कारण अंग्रेजों ने दो माह में ही 1857 के विद्रोह को कुचल दिया था। लेकिन जो अलख उस समय क्रांतिकारियों ने जगाई, उसके फलस्वरूप 90 वर्ष बाद देश गुलामी से मुक्त हुआ।
कसौली में बनाएं ऐतिहासिक स्तंभ
लोगों की मांग है कि कसौली में सरकार को ऐतिहासिक स्तंभ बनाना चाहिए। इस पर पंडित राम प्रसाद वैरागी, दरोगा बुध सिंह और सूबेदार भीम सिंह बहादुर तथा कसौली की क्रांति का उल्लेख करना चाहिए। इससे युवा पीढ़ी को कसौली के महत्वपूर्ण इतिहास की जानकारी मिलेगी।