राजस्थान: नसबंदी के बाद भी गर्भवती हुई महिला, बेटे के जन्म पर अदालत ने दिलाया 80 हजार का मुआवजा
नसबंदी ऑपरेशन विफल होने के बाद महिला के बेटे को जन्म देने के मामले में दौसा स्थायी लोक अदालत ने अस्पताल और स्वास्थ्य विभाग को कुल 80 हजार रुपये मुआवजा देने के आदेश दिए। राशि 15 दिन में देनी होगी।
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नसबंदी का ऑपरेशन विफल होने के बाद एक महिला के बच्चे को जन्म देने के मामले में स्थायी लोक अदालत ने पीड़िता के पक्ष में फैसला सुनाया है। अदालत ने संबंधित चिकित्सा संस्थान और स्वास्थ्य विभाग को पीड़िता को कुल 80 हजार रुपये की क्षतिपूर्ति देने का निर्देश दिया है। राशि का भुगतान 15 दिन के भीतर करने के आदेश दिए गए हैं।
तीन बच्चों के बाद कराया था नसबंदी ऑपरेशन
मामला रामगल्ला बनाम मधुर अस्पताल से संबंधित है। पीड़िता के पहले से तीन बच्चे थे। उसने 8 अप्रैल 2021 को बांदीकुई स्थित मधुर अस्पताल में नसबंदी का ऑपरेशन कराया था। इसके बावजूद नसबंदी सफल नहीं हुई और महिला दोबारा गर्भवती हो गई। 29 मई 2024 को उसने एक बेटे को जन्म दिया। इसके बाद पीड़िता ने स्थायी लोक अदालत, दौसा में परिवाद दाखिल किया। उसने बच्चे के पालन-पोषण, शिक्षा, विवाह और जीवनभर के संभावित खर्चों की भरपाई की मांग की थी।
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अस्पताल की दलील नहीं मानी
सुनवाई के दौरान अस्पताल प्रशासन और अन्य पक्षों ने दलील दी कि नसबंदी ऑपरेशन के बाद भी विफलता की संभावना रहती है। इसलिए इसके लिए चिकित्सक या अस्पताल को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। प्रतिपक्ष ने यह भी कहा कि गर्भावस्था का पता चलने पर महिला गर्भपात करा सकती थी।
स्थायी लोक अदालत के पूर्णकालिक अध्यक्ष राजेश चंद्र गुप्ता तथा सदस्य सुरेश कुमार गोयल और पूनम शर्मा की पीठ ने साक्ष्यों और पूर्व के अदालती फैसलों का अध्ययन किया। पीठ ने माना कि नसबंदी ऑपरेशन चिकित्सकीय लापरवाही के कारण विफल हुआ। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी महिला को गर्भपात कराने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
मानसिक और शारीरिक क्षति का मुआवजा
अदालत ने माना कि नसबंदी विफल होने के कारण पीड़िता को मानसिक और शारीरिक क्षति हुई। इसकी भरपाई के लिए पीठ ने बांदीकुई के मधुर अस्पताल को 50 हजार रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया। इसके अलावा, सीएमएचओ कार्यालय को परिवार नियोजन क्षतिपूर्ति योजना के तहत 30 हजार रुपये देने के निर्देश दिए गए। इस तरह अस्पताल और स्वास्थ्य विभाग को मिलाकर कुल 80 हजार रुपये की राशि 15 दिन के भीतर पीड़िता को देने के आदेश दिए गए हैं।