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एक इंसान नहीं पूरा परिवार झेलता है तेजाब का दर्द
अमर उजाला, लुधियाना
Updated Mon, 03 Feb 2014 09:37 PM IST
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देश के अलग अलग हिस्सों में तेजाबी हमलों की शिकार हुई पीड़ितों ने घरों से बाहर निकाल लोगों को हमले रोकने को जागरूक करने का बीड़ा उठाया है। स्टॉप एसिड अटैक मुहिम के दौरान लुधियाना पहुंची तेजाबी हमले की शिकार हुई तीन लड़कियों ने इस दौरान अपनी कहानी लोगों के साथ सांझा की।
लड़कियों ने कहा कि यह हमला सिर्फ उन पर नहीं बल्कि उनके परिवार पर हुआ है। हमला करने वाला एक मिनट में हमला कर फरार हो जाता है, जबकि लड़की को इसकी सजा सारी जिंदगी भुगतनी पड़ती है। हालात यह हो जाते हैं कि न तो हमले के बाद समाज जीने देता है और न ही परिवार वाले उनका साथ दे पाते हैं।
पीड़ित लक्ष्मी ने कहा कि तीन साल घर में कैदियों की तरह बिताने के बाद उसने पढ़ाई के दौरान यह सोचा कि अब वह समाज को तेजाबी हमले के बारे में जरूर जागरूक करेगी। उसने कहा कि 2005 में जब वह 15 साल की थी तो एक 32 वर्षीय व्यक्ति ने उस पर इस कारण तेजाब डाल दिया क्योंकि उसने उससे शादी करने से इंकार कर दिया था।
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चार दिन बाद वह लड़का पकड़ा गया और एक महीने में उसकी जमानत हो गई और उसने अपनी शादी करवा ली। आज उस लड़के की शादीशुदा जिंदगी सही चल रही है, लेकिन वह रोजाना मर-मर कर जी रही है। उसने कहा कि अब उसने इस बात का बीड़ा उठाया है कि जिस तरह वह नर्क भरी जिंदगी व्यतीत कर रही है उस तरह का जीवन कोई अन्य लड़की न करे।
उन्होंने कहा कि उनकी जागरूकता मुहिम के साथ अब तक चालीस से ज्यादा पीड़ित लड़कियां जुड़ चुकी हैं जो शहर-शहर जाकर समाज को इसके बारे में जागरुक कर रही है। 2008 में तेजाबी हमले की शिकार हुई दिल्ली निवासी रुपा ने कहा कि उस पर उसकी सौतेली मां ने तेजाब डाला था।
उसने कहा कि मां को डेढ़ साल की सजा मिली और उसके पिता ने ही सारा केस रफा दफा करवा दिया। अब वह अपना घर छोड़ इस मुहिम में जुड़ी है।
2013 में तेजाबी हमले की शिकार हुई सपना ने कहा कि उस पर उसके एक रिश्तेदार लड़के ने ही तेजाबी हमला कर दिया था। जिस कारण उसका चेहरा काफी झुलस गया। पहले तो वह अपना चेहरा छिपा कर घर में ही छिपी रहती थी। लेकिन जब तेजाबी हमलों में बढ़ावा हुआ तो वह भी लोगों को जागरुक कर रही है।
इस तेजाबी हमले रोकने की जागरुकता मुहिम चलाने वाले आलोक दीक्षित, आशीष शुक्ला और अभिलाष ने कहा कि उन्होंने तेजाबी हमलों की शिकार हुई पीड़ितों की मदद की शुरुआत सोशल मीडिया से की थी। उसके बाद अपनी वेबसाइट बनाई और दिल्ली में छां नाम का एक सेंटर बनाया। जहां पीड़ित लड़कियां रह रही हैं और वहीं डिजाइनिंग, टेलरिंग और अन्य काम कर रही है।
तेजाबी हमलों की पीड़ितों ने लोगों को अपील की है कि अगर किसी की बेटी पर तेजाबी हमला हो तो वह मौके पर ही उस पर ज्यादा से ज्यादा पानी डाल दे ताकि तेजाब के असर को कम किया जा सके। पीड़ित लड़कियों की अगवाई में कुछ लोगों ने रविवार देर रात सराभा नगर में कैंडल मार्च भी निकाला।
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लड़कियों ने कहा कि यह हमला सिर्फ उन पर नहीं बल्कि उनके परिवार पर हुआ है। हमला करने वाला एक मिनट में हमला कर फरार हो जाता है, जबकि लड़की को इसकी सजा सारी जिंदगी भुगतनी पड़ती है। हालात यह हो जाते हैं कि न तो हमले के बाद समाज जीने देता है और न ही परिवार वाले उनका साथ दे पाते हैं।
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पीड़ित लक्ष्मी ने कहा कि तीन साल घर में कैदियों की तरह बिताने के बाद उसने पढ़ाई के दौरान यह सोचा कि अब वह समाज को तेजाबी हमले के बारे में जरूर जागरूक करेगी। उसने कहा कि 2005 में जब वह 15 साल की थी तो एक 32 वर्षीय व्यक्ति ने उस पर इस कारण तेजाब डाल दिया क्योंकि उसने उससे शादी करने से इंकार कर दिया था।
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चार दिन बाद वह लड़का पकड़ा गया और एक महीने में उसकी जमानत हो गई और उसने अपनी शादी करवा ली। आज उस लड़के की शादीशुदा जिंदगी सही चल रही है, लेकिन वह रोजाना मर-मर कर जी रही है। उसने कहा कि अब उसने इस बात का बीड़ा उठाया है कि जिस तरह वह नर्क भरी जिंदगी व्यतीत कर रही है उस तरह का जीवन कोई अन्य लड़की न करे।
उन्होंने कहा कि उनकी जागरूकता मुहिम के साथ अब तक चालीस से ज्यादा पीड़ित लड़कियां जुड़ चुकी हैं जो शहर-शहर जाकर समाज को इसके बारे में जागरुक कर रही है। 2008 में तेजाबी हमले की शिकार हुई दिल्ली निवासी रुपा ने कहा कि उस पर उसकी सौतेली मां ने तेजाब डाला था।
उसने कहा कि मां को डेढ़ साल की सजा मिली और उसके पिता ने ही सारा केस रफा दफा करवा दिया। अब वह अपना घर छोड़ इस मुहिम में जुड़ी है।
2013 में तेजाबी हमले की शिकार हुई सपना ने कहा कि उस पर उसके एक रिश्तेदार लड़के ने ही तेजाबी हमला कर दिया था। जिस कारण उसका चेहरा काफी झुलस गया। पहले तो वह अपना चेहरा छिपा कर घर में ही छिपी रहती थी। लेकिन जब तेजाबी हमलों में बढ़ावा हुआ तो वह भी लोगों को जागरुक कर रही है।
इस तेजाबी हमले रोकने की जागरुकता मुहिम चलाने वाले आलोक दीक्षित, आशीष शुक्ला और अभिलाष ने कहा कि उन्होंने तेजाबी हमलों की शिकार हुई पीड़ितों की मदद की शुरुआत सोशल मीडिया से की थी। उसके बाद अपनी वेबसाइट बनाई और दिल्ली में छां नाम का एक सेंटर बनाया। जहां पीड़ित लड़कियां रह रही हैं और वहीं डिजाइनिंग, टेलरिंग और अन्य काम कर रही है।
तेजाबी हमलों की पीड़ितों ने लोगों को अपील की है कि अगर किसी की बेटी पर तेजाबी हमला हो तो वह मौके पर ही उस पर ज्यादा से ज्यादा पानी डाल दे ताकि तेजाब के असर को कम किया जा सके। पीड़ित लड़कियों की अगवाई में कुछ लोगों ने रविवार देर रात सराभा नगर में कैंडल मार्च भी निकाला।