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Hindi News ›   Punjab ›   Lack of education and unemployment are main reasons for youth of Punjab border villages joining drug smuggling

जमीनी हकीकत: सीमांत गांवों के बेरोजगार युवाओं का फायदा उठा रहा पाकिस्तान, आईएसआई ने रुपयों का लालच दे अपने साथ जोड़ा

Sat, 21 May 2022 03:49 PM IST
निवेदिता वर्मा अनिल कुमार, संवाद न्यूज एजेंसी, फिरोजपुर (पंजाब)
अनिल कुमार, संवाद न्यूज एजेंसी, फिरोजपुर (पंजाब) Published by: निवेदिता वर्मा Updated Sat, 21 May 2022 03:49 PM IST
सार

सीमा से सटे गांव गट्टी राजोके स्थित सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूल के प्रिंसिपल सतिंदर सिंह का कहना है कि सीमांत ग्रामीणों के पास खेतीबाड़ी कार्य तीन महीने का है, जबकि वे नौ माह खाली रहते हैं। इन्हें सतलुज दरिया की भी मार पड़ती है।  

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Lack of education and unemployment are main reasons for youth of Punjab border villages joining drug smuggling
फिरोजपुर का सीमांत गांव भाने वाला (गट्टी रहीमे) - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी।

विस्तार

पंजाब के सीमांत गांवों के युवाओं का हेरोइन व हथियार तस्करी के धंधे में जुड़ने का मुख्य कारण यहां शिक्षा का अभाव और बेरोजगारी है। इसी का फायदा पाकिस्तान में बैठे आतंकी संगठन और वहां की खुफिया एजेंसी आईएसआई उठा रही हैं। ये लोग युवाओं को रुपयों का लालच देकर पंजाब में छिपकर बैठे अपने स्लीपर सेलों तक विस्फोटक सामग्री, हेरोइन व घातक हथियारों पहुंचाने में जुटे हैं, ताकि पंजाब की शांति को भंग कर सके। 

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युवाओं की इस हरकत से भारत की सुरक्षा खतरे में है। इसके अलावा सरकार बार्डर डेवलपमेंट फंड भेजती है, यह फंड जीरो लाइन से लेकर पांच किलोमीटर एरिया में फैले सीमांत गांवों में खर्च किया जाना चाहिए, जबकि उक्त फंड पंद्रह किलोमीटर के दायरे फैले क्षेत्रों (शहरी इलाका) में खर्च कर दिया जाता है। यही कारण है कि सीमावर्ती गांवों में विकास नहीं हो पाता। यहां युवाओं की उच्च शिक्षा के लिए नजदीक में कोई सरकारी कॉलेज नहीं है। 

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सरकारी बसें तक नहीं आती गांवों में 

सरहद से सटे गांव गट्टी रहीमे निवासी बलवीर सिंह का कहना है कि गांव में कोई बुनियादी सहूलियतें नहीं है। गांव में बैंक और पोस्ट आफिस नहीं है। सरकारी बस तक गांवों में नहीं आती है। सीमांत गांवों के युवाओं के लिए नजदीक में कोई आईटीआई और सरकारी कॉलेज तक नहीं है। फिरोजपुर में सरकारी कालेज स्थापित किया है, जो फिरोजपुर शहर से भी दूर है। बार्डर डेवलपमेंट फंड आता है, उसे जीरो लाइन से पांच किलोमीटर एरिया तक इस्तेमाल करना चाहिए, जिसे शहरी इलाकों में खर्च दिया जाता है। यही कारण है कि सीमांत गांवों में विकास नहीं हो पाता है। सीमांत गांवों के युवा बेरोजगार हैं, बहुत से युवा कच्ची दारू बनाने में जुटे हैं। कई युवा पाक तस्करों, वहां की खुफिया एजेंसी आईएसआई व आतंकी संगठनों के संपर्क में है, जो रुपयों की लालच में गलत काम करने में लगे हैं। ये आतंकी गतिविधियों में कब संलिप्त हो जाते हैं, इनके बारे में उनके परिवार वालों को भी खबर नहीं होती है। सरकार इन्हें रोजगार देने वास्ते कोई उद्योग स्थापित करे, ताकि ये गलत धंधों से वापस आ सके।

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कोई फैक्टरी नहीं

ग्रामीण मक्खन सिंह व रुलिया सिंह का कहना है कि फिरोजपुर में कोई उद्योग व फैक्टरी तक नहीं है। भारत-पाक सीमा लगभग 553 किलोमीटर लंबी है, जो पंजाब से सटी है। इसी के साथ सतलुज दरिया बहता है, जो कई बार पाक में घुसकर भारत में प्रवेश करता है, यह भी तस्करी को बढ़ावा देता है। गांवों में कोई बुनियादी सहूलियतें नहीं है, यहां के लोगों को पीने का शुद्ध पानी तक नहीं है। यहां के ज्यादातर युवा रोजगार नहीं होने के चलते सरहद पर तस्करी के धंधे से जुड़ चुके हैं। ये देश की सुरक्षा के लिए खतरे की घंटी है।

पंचायती जमीन न होने से नहीं बन सके स्कूल

नौजवान हंसा सिंह, गुरदेव सिंह व गुरचरण सिंह वासी गट्टी रहीमे का कहना है कि उनके गांवों में पंचायती जमीन नहीं है। वर्ष 2014 में गट्टी रहीमे में आदर्श स्कूल स्थापित किया जाना था, यहां पंचायती जमीन नहीं होने के कारण स्कूल नहीं बन सका। इस क्षेत्र में कोई सरकारी कॉलेज नहीं है। यही कारण है कि यहां के बच्चे 12वीं तक बड़ी मुश्किल से पढ़ते हैं। उसके बाद भी कोई रोजगार नहीं मिलता। यही कारण है कि यहां के ज्यादातर युवा रुपयों के लालच में पाकिस्तान में बैठे आतंकी संगठनों के संपर्क में आ जाते हैं और सरहद पर विस्फोटक सामग्री, हेरोइन व घातक हथियार की तस्करी करने में जुट जाते हैं। सीमांत गांव चांदीवाला, झुग्गे निहंगे वाले, मक्खू व धर्मूवाला (जलालाबाद) के नौजवान पाक से आई विस्फोटक सामग्री संग पकड़े जा चुके हैं। गुरदेव ने कहा कि अभी भी सरकार सीमांत गांवों के युवाओं को रोजगार मुहैया करवाए तो बाकी के युवा तस्करी के धंधे से बच सकते हैं।



उधर, सीमा से सटा गांव गट्टी राजोके स्थित सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूल के प्रिंसिपल सतिंदर सिंह का कहना है कि सीमांत ग्रामीणों के पास खेतीबाड़ी कार्य तीन महीने का है, जबकि वे नौ माह खाली रहते हैं। इन्हें सतलुज दरिया की भी मार पड़ती है। यहां के युवाओं और ग्रामीणों को इलेक्ट्रिक व इलेक्ट्रोनिक्स, खिलौने बनाने, दर्जी का काम के अलावा हाथ से किए जाने वाले अन्य कार्यों की सिखलाई देनी चाहिए, ताकि खेतीबाड़ी के बाद ये काम भी कर सके। सीमांत गांव बारेके में सरकारी कॉलेज व आईटीआई स्थापित की जानी चाहिए ताकि यहां के गरीब वर्ग के बच्चे भी पैदल जाकर उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकें। शहर तक जाना यहां के सभी बच्चों की पहुंच नहीं है।

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