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अकाली दल के एकतरफा प्यार से भाजपा की ना: 117 सीटों पर लड़ने के एलान से गड़बड़ाया गणित, असमंजस में वर्कर

Wed, 26 Aug 2026 09:02 AM IST
Nivedita सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर
सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर Published by: Nivedita Updated Wed, 26 Aug 2026 09:02 AM IST
सार

भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव बीएल संतोष ने पंजाब दौरे के दौरान 117 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का एलान किया है। इसके बाद से दोनों दलों के बीच समझाैते पर असमंजस बढ़ गया है।

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Punjab politics alliance between Shiromani Akali Dal Bharatiya Janata Party uncertainty
पंजाब चुनाव - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

पंजाब की राजनीति में शिरोमणि अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी के रिश्तों को लेकर नया मोड़ आ गया है। अकाली दल के नेता जहां भाजपा के साथ गठबंधन की संभावना तलाश रहे हैं, वहीं भाजपा ने सभी 117 विधानसभा सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का एलान किया है। भाजपा के इस स्पष्ट रुख से अकाली दल के जमीनी कार्यकर्ता असमंजस में हैं। वे पार्टी की आगामी चुनावी रणनीति को लेकर नेतृत्व से स्पष्टता चाहते हैं।
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अकाली दल के कई वरिष्ठ नेताओं ने हाल ही में भाजपा के साथ गठबंधन के संकेत दिए हैं। बठिंडा की सांसद हरसिमरत कौर बादल ने पंजाब में तरक्की और विकास के लिए दिल्ली के साथ समझौते की बात कही थी।
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अकाली दल के महासचिव विक्रम सिंह मजीठिया ने दोनों दलों के फिर से साथ आने को समय की मांग बताया। वरिष्ठ नेता सिकंदर सिंह मलूका ने दावा किया कि पंजाब के लोग अकाली-भाजपा गठबंधन चाहते हैं। मुख्य प्रवक्ता दलजीत सिंह चीमा ने कहा कि यदि भाजपा से औपचारिक प्रस्ताव आता है तो अकाली दल उस पर विचार करेगा। 
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उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी गठबंधन में पंजाब के हित और पार्टी की पहचान सर्वोपरि रहेगी। कार्यकारी अध्यक्ष बलविंदर सिंह भूंदड़ ने राजनीतिक स्थिरता के लिए दोनों दलों के साथ आने को सकारात्मक बताया था।

उनके बयानों के बाद ही भाजपा नेताओं ने गठबंधन की चर्चाओं को अफवाह बताया। भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव बी.एल. संतोष ने पंजाब दौरे के दौरान 117 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की बात दोहराई। राष्ट्रीय प्रवक्ता आरपी सिंह और केसर सिंह लों ने भी सभी सीटों पर चुनाव की तैयारी पूरी होने का दावा किया। भाजपा का कहना है कि उसका गठबंधन किसी राजनीतिक दल से नहीं, बल्कि पंजाब की जनता के साथ है।

कार्यकर्ताओं में असमंजस
भाजपा के लगातार इन्कार से अकाली दल के जमीनी कार्यकर्ता असमंजस में हैं। वे जानना चाहते हैं कि यदि गठबंधन नहीं होता तो पार्टी की चुनावी रणनीति क्या होगी। कार्यकर्ताओं को यह भी चिंता है कि लगातार गठबंधन की चर्चा से पार्टी का अपना राजनीतिक नैरेटिव कमजोर हो सकता है। वे नेतृत्व से स्पष्ट दिशा चाहते हैं कि भाजपा के साथ जाना है, अकेले लड़ना है या दोनों विकल्प खुले रखने हैं। फिलहाल, अकाली दल के नेता पुराने साथी के साथ रिश्ते की संभावनाओं को हवा दे रहे हैं। वहीं, भाजपा अपने संगठन को सभी 117 सीटों पर खड़ा करने का दावा कर रही है।

दशकों पुराना रिश्ता और वर्तमान विरोधाभास
अकाली दल और भाजपा का रिश्ता पंजाब की राजनीति में दशकों पुराना रहा है। दोनों दलों ने लंबे समय तक मिलकर चुनाव लड़े और सरकार भी चलाई। हालांकि, किसान आंदोलन के दौरान गठबंधन टूट गया और दोनों ने अलग रास्ता चुना। 2027 के चुनाव से पहले पुराने रिश्ते की चर्चा फिर से शुरू हुई है। इस बार अकाली दल की ओर से गठबंधन की इच्छा सार्वजनिक हो रही है। जबकि भाजपा अपने स्वतंत्र राजनीतिक विस्तार पर जोर दे रही है। यह विरोधाभास अब पंजाब की राजनीति का एक बड़ा सवाल बन गया है।

चुनावी गणित और संभावित प्रभाव
यदि भविष्य में अकाली दल और भाजपा का गठबंधन बनता है, तो इसका असर सभी 117 सीटों पर एक जैसा नहीं होगा। 2022 के विधानसभा चुनाव में अकाली दल ने 18.38 फीसदी वोट लेकर तीन सीटें जीती थीं। भाजपा को 6.60 फीसदी वोट मिले थे और उसके दो उम्मीदवार विजयी रहे थे। दोनों दलों का वोट शेयर जोड़ने पर यह करीब 25 फीसदी बैठता है। 2017 में पुराने गठबंधन ने कुल 18 सीटें जीती थीं, जिसमें अकाली दल ने 15 और भाजपा ने तीन सीटें हासिल की थीं। करीब 21 सीटें ऐसी मानी जा सकती हैं जहां दोनों दलों के पारंपरिक वोट बैंक एक-दूसरे को मजबूत कर सकते हैं। माझा क्षेत्र की गुरदासपुर, दीनानगर, कादियां, डेरा बाबा नानक, बटाला और अमृतसर की कुछ सीटें इसमें शामिल हैं।
 
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