{"_id":"5acb94264f1c1b636b8b48de","slug":"111523291174-jalandhar-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"लाहौर-अमृतसर के बीच व्यापार व सुरक्षा की दृष्टि से अंग्रेजों ने दस अप्रैल 1","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
लाहौर-अमृतसर के बीच व्यापार व सुरक्षा की दृष्टि से अंग्रेजों ने दस अप्रैल 1
Updated Mon, 09 Apr 2018 09:56 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
156 वर्ष पहले पंजाब में चली पहली पैसेंजर ट्रेन
लाहौर-अमृतसर के बीच व्यापार व सुरक्षा की दृष्टि से अंग्रेजों ने दस अप्रैल 1862 में चलाई थी ट्रेन
जनरल बोगी का किराया था चार आना, महाराजा जगतजीत सिंह भी ट्रेन के उद्घाटन के समय थे मौजूद
अनिल कुमार
फिरोजपुर।
अंग्रेजों ने व्यापार और सुरक्षा को मद्देनजर रखते हुए पंजाब में सबसे पहली ट्रेन दस अप्रैल 1862 में लाहौर-अमृतसर के बीच चलाई थी, जिसे दस अप्रैल को 156 वर्ष हो जाएंगे। लाहौर से अमृतसर बैसाखी मेला देखने के लिए ट्रेन में पहले दिन तीन हजार लोगों ने सफर किया था। नौ स्टेशन और दूरी पचास किलोमीटर थी, जिसे ट्रेन ने दो घंटे में तय किया था। जनरल बोगी में सफर करने का किराया चार आना था। ट्रेन के उद्घाटन के समय कपूरथला के महाराजा जगतजीत सिंह भी उपस्थित थे।
रेल मंडल फिरोजपुर के डीआरएम विवेक कुमार ने बताया कि रेलवे का इतिहास बहुत ही महत्वपूर्ण है और युवा पीढ़ी को रेलवे का इतिहास पता होना जरूरी है। अंग्रेजों ने पंजाब में व्यापार और सुरक्षा की दृष्टि से दस अप्रैल 1862 को पहली पैसेंजर ट्रेन लाहौर-अमृतसर के बीच चलाई थी। इसमें छह जनरल बोगी, दो सेकेंड क्लास व एक ब्रेक थी। तीस किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से पचास किलोमीटर का सफर लगभग दो घंटे में तय करती थी। अमृतसर और लाहौर के बीच कुल नौ स्टेशन हैं, जिनमें अमृतसर, छेहराटा, खासा, अटारी, वाघा, जलोहर, हरबंसपुरा, मुगलपुरा व लाहौर शामिल हैं। विदेश से इंजन के पार्ट्स कराची मंगवाए थे। कराची में इंजन तैयार किया गया था। उसके बाद हाथियों के सहयोग से इंजन को लाहौर रेलवे स्टेशन पहुंचाया गया था।
ट्रेन का किराया था चार आना
पंजाब में चली पहली ट्रेन के जनरल क्लास का किराया चार आना था। फर्स्ट और सेकेंड क्लास का किराया तीन रुपये था। 12 आना देकर लोग थर्ड क्लास में रिजर्वेशन करवाया करते थे। रविवार के दिन सिर्फ दोनों तरफ से एक ही ट्रेन चलती थी। बाकी दिन दो-दो ट्रेनें दोनों तरफ से चलती थी।
विज्ञापन
अमृतसर व लाहौर में थे बड़े व्यापारी
अमृतसर और लाहौर में बड़े व्यापारी थे। वूलन का भी बहुत कारोबार था। अंग्रेजों ने व्यापार को बढ़ावा देने के लिए पंजाब में ट्रेन चलाई थी। यही नहीं अंग्रेजों ने व्यापार के लिए मुलतान-लाहौर, दिल्ली-मुंबई व कोलकाता को रेल लाइन से जोड़ा, क्योंकि मुंबई व कोलकाता में समुद्र किनारे पड़ते हैं। इसके अलावा अमृतसर-दिल्ली के बीच ट्रैक बिछाने का काम 1865 में शुरू हुआ और 1870 में पूरा हो गया। इनके बीच तीन बड़े पुल ब्यास, सतलुज व घगगर दरिया पर बनाए गए हैं।
ट्रैक बिछाने में लगे छह साल
सिंध-पंजाब एंड दिल्ली रेलवे के इंजीनियर विलियन ब्रूनटन की देख-रेख में जुलाई 1856 में लाहौर-अमृतसर के बीच ट्रैक बिछाने के लिए मिट्टी व पत्थर डालने का कार्य शुरू हुआ। ट्रैक बिछाने के लिए आठ फरवरी 1859 में अंग्रेज अधिकारी जोनस लारनस ने नींव पत्थर रखा। एक मार्च 1862 में ट्रैक पूरा हो गया। मार्च 1862 में लाहौर रेलवे स्टेशन पर इंजन पहुंचाया गया।
विज्ञापन
लाहौर-अमृतसर के बीच व्यापार व सुरक्षा की दृष्टि से अंग्रेजों ने दस अप्रैल 1862 में चलाई थी ट्रेन
जनरल बोगी का किराया था चार आना, महाराजा जगतजीत सिंह भी ट्रेन के उद्घाटन के समय थे मौजूद
अनिल कुमार
फिरोजपुर।
अंग्रेजों ने व्यापार और सुरक्षा को मद्देनजर रखते हुए पंजाब में सबसे पहली ट्रेन दस अप्रैल 1862 में लाहौर-अमृतसर के बीच चलाई थी, जिसे दस अप्रैल को 156 वर्ष हो जाएंगे। लाहौर से अमृतसर बैसाखी मेला देखने के लिए ट्रेन में पहले दिन तीन हजार लोगों ने सफर किया था। नौ स्टेशन और दूरी पचास किलोमीटर थी, जिसे ट्रेन ने दो घंटे में तय किया था। जनरल बोगी में सफर करने का किराया चार आना था। ट्रेन के उद्घाटन के समय कपूरथला के महाराजा जगतजीत सिंह भी उपस्थित थे।
रेल मंडल फिरोजपुर के डीआरएम विवेक कुमार ने बताया कि रेलवे का इतिहास बहुत ही महत्वपूर्ण है और युवा पीढ़ी को रेलवे का इतिहास पता होना जरूरी है। अंग्रेजों ने पंजाब में व्यापार और सुरक्षा की दृष्टि से दस अप्रैल 1862 को पहली पैसेंजर ट्रेन लाहौर-अमृतसर के बीच चलाई थी। इसमें छह जनरल बोगी, दो सेकेंड क्लास व एक ब्रेक थी। तीस किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से पचास किलोमीटर का सफर लगभग दो घंटे में तय करती थी। अमृतसर और लाहौर के बीच कुल नौ स्टेशन हैं, जिनमें अमृतसर, छेहराटा, खासा, अटारी, वाघा, जलोहर, हरबंसपुरा, मुगलपुरा व लाहौर शामिल हैं। विदेश से इंजन के पार्ट्स कराची मंगवाए थे। कराची में इंजन तैयार किया गया था। उसके बाद हाथियों के सहयोग से इंजन को लाहौर रेलवे स्टेशन पहुंचाया गया था।
विज्ञापन
ट्रेन का किराया था चार आना
पंजाब में चली पहली ट्रेन के जनरल क्लास का किराया चार आना था। फर्स्ट और सेकेंड क्लास का किराया तीन रुपये था। 12 आना देकर लोग थर्ड क्लास में रिजर्वेशन करवाया करते थे। रविवार के दिन सिर्फ दोनों तरफ से एक ही ट्रेन चलती थी। बाकी दिन दो-दो ट्रेनें दोनों तरफ से चलती थी।
विज्ञापन
अमृतसर व लाहौर में थे बड़े व्यापारी
अमृतसर और लाहौर में बड़े व्यापारी थे। वूलन का भी बहुत कारोबार था। अंग्रेजों ने व्यापार को बढ़ावा देने के लिए पंजाब में ट्रेन चलाई थी। यही नहीं अंग्रेजों ने व्यापार के लिए मुलतान-लाहौर, दिल्ली-मुंबई व कोलकाता को रेल लाइन से जोड़ा, क्योंकि मुंबई व कोलकाता में समुद्र किनारे पड़ते हैं। इसके अलावा अमृतसर-दिल्ली के बीच ट्रैक बिछाने का काम 1865 में शुरू हुआ और 1870 में पूरा हो गया। इनके बीच तीन बड़े पुल ब्यास, सतलुज व घगगर दरिया पर बनाए गए हैं।
ट्रैक बिछाने में लगे छह साल
सिंध-पंजाब एंड दिल्ली रेलवे के इंजीनियर विलियन ब्रूनटन की देख-रेख में जुलाई 1856 में लाहौर-अमृतसर के बीच ट्रैक बिछाने के लिए मिट्टी व पत्थर डालने का कार्य शुरू हुआ। ट्रैक बिछाने के लिए आठ फरवरी 1859 में अंग्रेज अधिकारी जोनस लारनस ने नींव पत्थर रखा। एक मार्च 1862 में ट्रैक पूरा हो गया। मार्च 1862 में लाहौर रेलवे स्टेशन पर इंजन पहुंचाया गया।