{"_id":"6ac89de52777bbfbef05fcc5","slug":"rajbir-ghuman-high-court-returns-petition-regarding-cbi-fir-advises-approaching-the-appropriate-forum-2026-10-09","type":"story","status":"publish","title_hn":"राजबीर घुमन को राहत नहीं: सीबीआई की एफआईआर पर हाईकोर्ट ने लौटाई याचिका, उचित मंच पर जाने की सलाह","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
राजबीर घुमन को राहत नहीं: सीबीआई की एफआईआर पर हाईकोर्ट ने लौटाई याचिका, उचित मंच पर जाने की सलाह
Fri, 09 Oct 2026 01:25 PM IST
Nivedita
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: Nivedita
Updated Fri, 09 Oct 2026 01:25 PM IST
सार
याचिका के अनुसार, पंजाब सरकार ने 31 मार्च 2022 के आदेश के तहत राजबीर सिंह घुमन को मुख्यमंत्री कार्यालय में विशेष ड्यूटी अधिकारी नियुक्त किया था। इसके बाद 31 अक्तूबर 2025 को भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो, पंजाब के निदेशक को एक शिकायत दी गई थी।
विज्ञापन
पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
पंजाब के मुख्यमंत्री कार्यालय में विशेष ड्यूटी पर तैनात अधिकारी राजबीर सिंह घुमन को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट से फिलहाल राहत नहीं मिली है। घुमन ने सीबीआई की ओर से दर्ज प्राथमिकी और उनके पैतृक आवास पर की गई तलाशी को चुनौती दी थी।
न्यायमूर्ति जेएस बेदी ने कहा कि मामला उनकी पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए उपयुक्त नहीं है, क्योंकि संबंधित प्राथमिकी हाई कोर्ट की खंडपीठ के आदेश पर दर्ज की गई थी। अदालत ने याचिकाकर्ता को उचित मंच पर जाने की सलाह दी।
घुमन ने अपनी याचिका में आरोप लगाया है कि उनके खिलाफ कार्रवाई शुरू करने से पहले भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए के तहत पंजाब सरकार से अनिवार्य पूर्व मंजूरी नहीं ली गई। उनका कहना है कि मामला उनके सरकारी कार्यों और अधिकारियों के स्थानांतरण एवं तैनाती से जुड़े कथित निर्णयों से संबंधित है। ऐसे में जांच से पहले सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी जरूरी थी।
विज्ञापन
हाई कोर्ट के आदेश के बाद सीबीआई ने दर्ज की प्राथमिकी
याचिका के अनुसार, पंजाब सरकार ने 31 मार्च 2022 के आदेश के तहत राजबीर सिंह घुमन को मुख्यमंत्री कार्यालय में विशेष ड्यूटी अधिकारी नियुक्त किया था। इसके बाद 31 अक्तूबर 2025 को भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो, पंजाब के निदेशक को एक शिकायत दी गई थी।
घुमन ने दावा किया है कि पांच अक्तूबर 2026 को पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट की एक खंडपीठ ने एक अन्य याचिका पर सुनवाई करते हुए सीबीआई को मामले में प्राथमिकी दर्ज कर जांच आगे बढ़ाने का निर्देश दिया था। इसी दिन सीबीआई की आर्थिक अपराध शाखा-द्वितीय, नई दिल्ली ने प्राथमिकी दर्ज की। इसमें भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की विभिन्न धाराओं के साथ भारतीय न्याय संहिता की धाराएं भी लगाई गईं।
याचिकाकर्ता के मुताबिक, प्राथमिकी दर्ज होने के अगले दिन छह अक्तूबर को सीबीआई के सहायक पुलिस अधीक्षक ने चंडीगढ़ स्थित विशेष अदालत से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 96 के तहत तलाशी वारंट हासिल किया। इसके बाद पंजाब के संगरूर जिले में स्थित उनके पैतृक गांव घराचों के आवास पर तलाशी ली गई। घुमन ने आरोप लगाया है कि तलाशी के दौरान परिवार के सदस्य मौजूद नहीं थे और कार्रवाई देर रात तक चली।
धारा 17ए के तहत पूर्व मंजूरी नहीं लेने का आरोप
घुम्मन ने याचिका में सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा है कि सरकारी अधिकारियों के आधिकारिक निर्णयों या सिफारिशों से जुड़े भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच शुरू करने से पहले भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए के तहत सक्षम सरकार की पूर्व मंजूरी आवश्यक है।
याचिका में यह भी दावा किया गया है कि पंजाब सरकार ने वर्ष 2021 में इस संबंध में मानक संचालन प्रक्रिया अपनाई थी। इसके तहत निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार मंजूरी लेना जरूरी था। घुमन ने सीबीआई की प्राथमिकी रद करने, तलाशी वारंट और तलाशी की कार्रवाई को अवैध घोषित करने तथा आगे की कार्रवाई पर रोक लगाने की मांग की है।
उन्होंने पंजाब सरकार से संबंधित अभिलेख पेश करने की मांग भी की है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि उनके खिलाफ धारा 17ए के तहत पूर्व मंजूरी मांगी गई थी या नहीं। याचिका में आरोप लगाया गया है कि इस कार्रवाई से उनके मौलिक अधिकार प्रभावित हुए हैं। हालांकि, हाई कोर्ट की संबंधित पीठ ने मामले की सुनवाई करने से इनकार करते हुए उन्हें उचित मंच पर जाने की सलाह दी है।
विज्ञापन
न्यायमूर्ति जेएस बेदी ने कहा कि मामला उनकी पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए उपयुक्त नहीं है, क्योंकि संबंधित प्राथमिकी हाई कोर्ट की खंडपीठ के आदेश पर दर्ज की गई थी। अदालत ने याचिकाकर्ता को उचित मंच पर जाने की सलाह दी।
विज्ञापन
घुमन ने अपनी याचिका में आरोप लगाया है कि उनके खिलाफ कार्रवाई शुरू करने से पहले भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए के तहत पंजाब सरकार से अनिवार्य पूर्व मंजूरी नहीं ली गई। उनका कहना है कि मामला उनके सरकारी कार्यों और अधिकारियों के स्थानांतरण एवं तैनाती से जुड़े कथित निर्णयों से संबंधित है। ऐसे में जांच से पहले सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी जरूरी थी।
विज्ञापन
हाई कोर्ट के आदेश के बाद सीबीआई ने दर्ज की प्राथमिकी
याचिका के अनुसार, पंजाब सरकार ने 31 मार्च 2022 के आदेश के तहत राजबीर सिंह घुमन को मुख्यमंत्री कार्यालय में विशेष ड्यूटी अधिकारी नियुक्त किया था। इसके बाद 31 अक्तूबर 2025 को भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो, पंजाब के निदेशक को एक शिकायत दी गई थी।
घुमन ने दावा किया है कि पांच अक्तूबर 2026 को पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट की एक खंडपीठ ने एक अन्य याचिका पर सुनवाई करते हुए सीबीआई को मामले में प्राथमिकी दर्ज कर जांच आगे बढ़ाने का निर्देश दिया था। इसी दिन सीबीआई की आर्थिक अपराध शाखा-द्वितीय, नई दिल्ली ने प्राथमिकी दर्ज की। इसमें भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की विभिन्न धाराओं के साथ भारतीय न्याय संहिता की धाराएं भी लगाई गईं।
याचिकाकर्ता के मुताबिक, प्राथमिकी दर्ज होने के अगले दिन छह अक्तूबर को सीबीआई के सहायक पुलिस अधीक्षक ने चंडीगढ़ स्थित विशेष अदालत से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 96 के तहत तलाशी वारंट हासिल किया। इसके बाद पंजाब के संगरूर जिले में स्थित उनके पैतृक गांव घराचों के आवास पर तलाशी ली गई। घुमन ने आरोप लगाया है कि तलाशी के दौरान परिवार के सदस्य मौजूद नहीं थे और कार्रवाई देर रात तक चली।
धारा 17ए के तहत पूर्व मंजूरी नहीं लेने का आरोप
घुम्मन ने याचिका में सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा है कि सरकारी अधिकारियों के आधिकारिक निर्णयों या सिफारिशों से जुड़े भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच शुरू करने से पहले भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए के तहत सक्षम सरकार की पूर्व मंजूरी आवश्यक है।
याचिका में यह भी दावा किया गया है कि पंजाब सरकार ने वर्ष 2021 में इस संबंध में मानक संचालन प्रक्रिया अपनाई थी। इसके तहत निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार मंजूरी लेना जरूरी था। घुमन ने सीबीआई की प्राथमिकी रद करने, तलाशी वारंट और तलाशी की कार्रवाई को अवैध घोषित करने तथा आगे की कार्रवाई पर रोक लगाने की मांग की है।
उन्होंने पंजाब सरकार से संबंधित अभिलेख पेश करने की मांग भी की है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि उनके खिलाफ धारा 17ए के तहत पूर्व मंजूरी मांगी गई थी या नहीं। याचिका में आरोप लगाया गया है कि इस कार्रवाई से उनके मौलिक अधिकार प्रभावित हुए हैं। हालांकि, हाई कोर्ट की संबंधित पीठ ने मामले की सुनवाई करने से इनकार करते हुए उन्हें उचित मंच पर जाने की सलाह दी है।