विभाजन का दर्द: स्टीम इंजन के पानी से झुलस गई थी पूर्व मंत्री हरमोहन धवन की कलाई, दिलों पर बंटवारे का निशान
पाकिस्तान से विस्थापित होकर भारत आए कई परिवारों ने चंडीगढ़ में न केवल अपनी जिंदगी दोबारा शुरू की बल्कि यहां अपना नाम भी बनाया।
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स्वतंत्रता दिवस का जश्न मनाते हुए हमें उन लोगों की कहानियों को भी याद करना चाहिए, जिन्होंने 1947 के विभाजन के दौरान असहनीय दर्द और संघर्ष झेला। पाकिस्तान से विस्थापित होकर भारत आए कई परिवारों ने चंडीगढ़ में न केवल अपनी जिंदगी दोबारा शुरू की बल्कि यहां अपना नाम भी बनाया। पेश है ऐसे ही दो प्रमुख परिवारों की कहानियां...
कलाई पर रहे गए थे बंटवारे के निशान
पूर्व केंद्रीय मंत्री हरमोहन धवन की पत्नी सतिंदर धवन ने विभाजन के उन खौफनाक दिनों को याद करते हुए बताया कि उनके पति का परिवार पाकिस्तान के रावलपिंडी के फतेहजंग में एक समृद्ध कपड़ा व्यापारी था।
1947 में जब विभाजन का एलान हुआ तो चारों ओर तलवारें लहराई जाने लगीं और हिंदुओं का कत्लेआम शुरू हो गया। अपनी जान बचाने के लिए 7 साल के हरमोहन धवन अपने भाई-बहनों के साथ वाघा बॉर्डर पर स्थित एक शरणार्थी कैंप पहुंचे। वहां तीन दिनों तक उन्हें खाने को कुछ नहीं मिला। उन्हें जबरदस्त प्यास लगी थी। इसी बीच ट्रेन के स्टीम इंजन से गिर रहे पानी को पीने के लिए पहुंचे तो उनके हाथ की कलाई झुलस गई थी। यह निशान आजीवन के लिए बन गया।
कारोबारी से राजनीति तक का सफर तय किया
सतिंदर धवन ने बताया कि शरणार्थी कैंप से निकलने के बाद हरमोहन धवन और उनके परिवार को अंबाला में जगह मिली। वहां उनकी मां को अपने सोने के कंगन बेचने पड़े, ताकि वे देसी घी और खाने-पीने की कुछ चीजें बेचकर गुजारा कर सकें। बाद में उन्हें अंबाला में ही एक राशन डिपो आवंटित हुआ। हरमोहन धवन को पढ़ाई का बहुत शौक था लेकिन हालात ने उनसे किताबें छीन ली थीं। बावजूद इसके, उन्होंने हार नहीं मानी। 1960 में उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी के बॉटनी विभाग में एमएससी में दाखिला लिया और यहीं उनकी मुलाकात सतिंदर धवन से हुई। 1970 में उन्होंने एचएमटी के पार्ट्स बनाने का उद्योग शुरू किया और 1977 में राजनीति में कदम रखा। आज भी चंडीगढ़ के लोग उनकी ओर से किए गए कार्यों को याद करते हैं और विभाजन के उस दर्द ने उन्हें एक ऐसा नाम बना दिया, जिसे शहर कभी नहीं भुला सकता।
घर की छत पर मिट्टी का तेल लेकर बैठते थे सुभाष चावला के पिता
चंडीगढ़ की राजनीति में अपनी पहचान रखने वाले सुभाष चावला ने अपने परिवार के संघर्ष की कहानी साझा की। उनके दादा सुंदर सिंह चावला पाकिस्तान के सर्वाेदय जिले के रहने वाले थे। विभाजन के समय, कत्लेआम और महिलाओं के अपमान से बचने के लिए उनके पिता हरबंसलाल चावला अपने घर की छत पर मिट्टी का तेल लेकर बैठते थे। उनकी योजना थी कि अगर कोई बदमाश घर में घुसने की कोशिश करे तो वे अपने परिवार की महिलाओं को बचाने के लिए खुद को आग लगा लेंगे।
चंडीगढ़ में की नई शुरुआत
यह परिवार पाकिस्तान से बचकर पहले हरियाणा के रोहतक जिले के गूगहेड़ी गांव पहुंचा और फिर 1950 में चंडीगढ़ आ गया। यहां उनके दादा, पिता और भाइयों ने मिलकर छोटे-मोटे काम शुरू किए। धीरे-धीरे उनकी मेहनत रंग लाई और उन्होंने शहर में कई उद्योग और व्यापार स्थापित किए। विभाजन के दर्द से गुजरने के बावजूद अपने साहस और मेहनत के दम पर एक नई और सफल जिंदगी की नींव रखी।