{"_id":"6aca55ceea3c898b01023118","slug":"national-honor-for-pgi-dr-kusum-sharma-2026-10-10","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"पीजीआई की डॉ. कुसुम शर्मा को राष्ट्रीय सम्मान: जटिल टीबी की जांच में योगदान, मिला ‘विमेन इन मेडिसिन अवॉर्ड","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
पीजीआई की डॉ. कुसुम शर्मा को राष्ट्रीय सम्मान: जटिल टीबी की जांच में योगदान, मिला ‘विमेन इन मेडिसिन अवॉर्ड
Sat, 10 Oct 2026 08:42 PM IST
शाहिल शर्मा
माई सिटी रिपोर्टर, चंडीगढ़
माई सिटी रिपोर्टर, चंडीगढ़
Published by: शाहिल शर्मा
Updated Sat, 10 Oct 2026 08:42 PM IST
सार
डॉ. कुसुम शर्मा पिछले करीब दो दशक से एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी की जांच से जुड़ी जटिल चुनौतियों को दूर करने के लिए काम कर रही हैं। यह टीबी फेफड़ों के बजाय शरीर के दूसरे अंगों, जैसे मस्तिष्क, आंखों, पेट और हड्डियों को प्रभावित करती है।
विज्ञापन
डॉ. कुसुम शर्मा को मिला विमेन इन मेडिसिन अवॉर्ड
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
पीजीआई चंडीगढ़ के मेडिकल माइक्रोबायोलॉजी विभाग की प्रोफेसर और एक्स्ट्रा पल्मोनरी ट्यूबरकुलोसिस (ईपीटीबी) की नोडल अधिकारी डॉ. कुसुम शर्मा को चिकित्सा क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए नेशनल एकेडमी ऑफ मेडिकल साइंसेज (एनएएमएस) के प्रतिष्ठित ‘विमेन इन मेडिसिन अवार्ड-2026’ से सम्मानित किया गया। उन्हें यह सम्मान 10 अक्तूबर को तमिलनाडु स्थित एसआरएम मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर में आयोजित एनएएमएसकॉन-2026 के दीक्षांत समारोह में प्रदान किया गया।
विज्ञापन
डॉ. कुसुम शर्मा पिछले करीब दो दशक से एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी की जांच से जुड़ी जटिल चुनौतियों को दूर करने के लिए काम कर रही हैं। यह टीबी फेफड़ों के बजाय शरीर के दूसरे अंगों, जैसे मस्तिष्क, आंखों, पेट और हड्डियों को प्रभावित करती है। इसकी पहचान करना अक्सर मुश्किल होता है, क्योंकि प्रभावित अंगों से लिए गए नमूनों में टीबी के बैक्टीरिया की मात्रा बहुत कम हो सकती है। ऐसे में बीमारी की पुष्टि में देरी होती है और मरीज का इलाज समय पर शुरू नहीं हो पाता।
विज्ञापन
जटिल टीबी की पहचान के लिए विकसित की जांच तकनीक
डॉ. शर्मा के नेतृत्व में उनकी टीम ने बीमारी की पहचान कम समय में और अधिक सटीक तरीके से करने के लिए जांच तकनीक विकसित करने पर काम किया। उनकी टीम ने मल्टीप्लेक्स पीसीआर जांच विकसित की, जिसे पेटेंट भी मिला है। यह तकनीक मस्तिष्क, आंखों और आंतों से जुड़ी टीबी के मामलों में बैक्टीरिया के डीएनए का पता लगाने में मदद करती है। इस तकनीक का अमेरिका की जैक्सनविल स्टेट लेबोरेटरी में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सत्यापन भी किया गया।
विज्ञापन
Trending Videos
दूरदराज के स्वास्थ्य केंद्रों तक जांच पहुंचाने की पहल
जिन स्वास्थ्य केंद्रों में आधुनिक प्रयोगशालाओं की सुविधा उपलब्ध नहीं है, वहां भी टीबी की जांच संभव बनाने के लिए डॉ. शर्मा ने पोर्टेबल और बैटरी से चलने वाली जांच विधियों पर काम किया। इनमें मैग्नेटिक बीड्स और एलएएमपी तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। इन तकनीकों का उद्देश्य सीमित संसाधनों वाले केंद्रों में भी जांच की सुविधा उपलब्ध कराने में मदद करना है।
आंखों की टीबी में दवा प्रतिरोध पर भी किया काम
डॉ. शर्मा ने आंखों की टीबी में दवाओं के प्रति प्रतिरोध से संबंधित पहली वैश्विक रिपोर्ट का नेतृत्व भी किया। इस कार्य से आंखों की टीबी के मरीजों के इलाज के लिए चिकित्सकीय दिशा-निर्देश तैयार करने में योगदान मिला, जिनका इस्तेमाल नेत्र विशेषज्ञ करते हैं। इसके अलावा, ‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत उनकी टीम ने ट्रूनेट एमटीबी-प्लस जैसे स्वदेशी जांच प्लेटफॉर्म का सत्यापन किया। टीम ने दवा प्रतिरोधी टीबी के मामलों की पहचान के लिए उन्नत तकनीकों को जांच प्रक्रिया से जोड़ने पर भी काम किया है। डॉ. शर्मा को मिला यह राष्ट्रीय सम्मान टीबी की समय पर पहचान, जांच की सटीकता बढ़ाने और आधुनिक जांच तकनीकों को अधिक सुलभ बनाने के क्षेत्र में उनके लंबे योगदान को मान्यता देता है।