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दो दशक बाद केंद्र के खिलाफ मुखर हुआ शिअद, पंथक एजेंडे को आगे बढ़ाना चाहते हैं सुखबीर बादल
Fri, 02 Oct 2020 10:54 AM IST
पंजाब ब्यूरो
अशोक नीर, अमृतसर
अशोक नीर, अमृतसर
Published by: पंजाब ब्यूरो
Updated Fri, 02 Oct 2020 10:54 AM IST
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किसानों को संबोधित करते सुखबीर बादल
- फोटो : अमर उजाला
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प्रदेश की राजनीति में बीते दो दशकों में से डेढ़ दशक तक भाजपा के साथ सत्ता का सुख भोगने वाला शिअद किसान मुद्दे पर मोदी को निशाना बना कर अपने पंथक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए सक्रिय हो गया है। प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल के साथ-साथ इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के विरुद्ध मुखर रहा अकाली दल लगभग दो दशक के बाद केंद्र सरकार के विरुद्ध मोर्चा लगाने जा रहा है।
वहीं किसानों के समर्थन में निकाले जाने वाले मार्च सिखों के तीन बड़े तख्त साहिबान से शुरू करने के पीछे अकाली दल की रणनीति सिखों के धार्मिक जज्बातों को पार्टी के साथ जोड़ने की है।
1980 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सिख विरोधी नीतियों के विरुद्ध शुरू किया गया धर्म युद्ध मोर्चा भी श्री अकाल तख्त साहिब से शुरू किया गया था। सुखबीर बादल के पिता प्रकाश सिंह बादल इस मोर्चे की अगुवाई करने वाले पहले अकाली नेताओं में से थे।
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अब सुखबीर 2022 विधानसभा चुनाव से पहले किसान आंदोलन के माध्यम से प्रधानमंत्री मोदी के विरुद्ध लामबंद अपने पंथक वोटरों पर रिझाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। इन दो दशक में अकाली दल ने इस पंथक संगठन के मूल को बदल कर इसे पंजाबी पार्टी के रूप में आगे बढ़ाया है, उससे कई टकसाली अकाली परिवार बादल परिवार से बागी हो चुके हैं। बादल परिवार पर सिख संस्थाओं एसजीपीसी व श्री अकाल तख्त साहिब को कमजोर करने के आरोप लगते रहे हैं।
बरगाड़ी बेअदबी व बहिबलकलां गोली कांड ने शिअद पर पंथ विरोधी छाप लगा दी है। श्री गुरु ग्रंथ साहिब के लापता स्वरूपों का मामला बादल परिवार को फिर पंथक कटघरे में खड़ा कर रहा है। अब सुखबीर अपने परंपरागत किसान वोट बैंक को शिअद के साथ जोड़े रखने की एक बड़ी चुनौती का सामना कर रहे हैं। किसान संगठन शिअद की कार्यप्रणाली से गुस्साए हैं, ऐसे में उनका सफल होना आसान नहीं है।
आम आदमी पार्टी के तीन विधायकों ने जत्थेदार श्री अकाल तख्त साहिब को मांग पत्र सौंप कर आग्रह किया था कि सुखबीर बादल को सिख धर्म के साथ खिलवाड़ करने की आज्ञा न दी जाए और न ही तख्त साहिब से अकालियों को जुलूस निकालने की मंजूरी दी जाए। जत्थेदार ज्ञानी हरप्रीत सिंह ने आप की इस मांग पर कोई भी निर्णय नहीं लिया।
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वहीं किसानों के समर्थन में निकाले जाने वाले मार्च सिखों के तीन बड़े तख्त साहिबान से शुरू करने के पीछे अकाली दल की रणनीति सिखों के धार्मिक जज्बातों को पार्टी के साथ जोड़ने की है।
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1980 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सिख विरोधी नीतियों के विरुद्ध शुरू किया गया धर्म युद्ध मोर्चा भी श्री अकाल तख्त साहिब से शुरू किया गया था। सुखबीर बादल के पिता प्रकाश सिंह बादल इस मोर्चे की अगुवाई करने वाले पहले अकाली नेताओं में से थे।
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अब सुखबीर 2022 विधानसभा चुनाव से पहले किसान आंदोलन के माध्यम से प्रधानमंत्री मोदी के विरुद्ध लामबंद अपने पंथक वोटरों पर रिझाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। इन दो दशक में अकाली दल ने इस पंथक संगठन के मूल को बदल कर इसे पंजाबी पार्टी के रूप में आगे बढ़ाया है, उससे कई टकसाली अकाली परिवार बादल परिवार से बागी हो चुके हैं। बादल परिवार पर सिख संस्थाओं एसजीपीसी व श्री अकाल तख्त साहिब को कमजोर करने के आरोप लगते रहे हैं।
बरगाड़ी बेअदबी व बहिबलकलां गोली कांड ने शिअद पर पंथ विरोधी छाप लगा दी है। श्री गुरु ग्रंथ साहिब के लापता स्वरूपों का मामला बादल परिवार को फिर पंथक कटघरे में खड़ा कर रहा है। अब सुखबीर अपने परंपरागत किसान वोट बैंक को शिअद के साथ जोड़े रखने की एक बड़ी चुनौती का सामना कर रहे हैं। किसान संगठन शिअद की कार्यप्रणाली से गुस्साए हैं, ऐसे में उनका सफल होना आसान नहीं है।
आम आदमी पार्टी के तीन विधायकों ने जत्थेदार श्री अकाल तख्त साहिब को मांग पत्र सौंप कर आग्रह किया था कि सुखबीर बादल को सिख धर्म के साथ खिलवाड़ करने की आज्ञा न दी जाए और न ही तख्त साहिब से अकालियों को जुलूस निकालने की मंजूरी दी जाए। जत्थेदार ज्ञानी हरप्रीत सिंह ने आप की इस मांग पर कोई भी निर्णय नहीं लिया।
जत्थेदार रंजीत सिंह ब्रह्मपुरा ने किया एतराज
शिअद (टकसाली) के अध्यक्ष पूर्व सांसद जत्थेदार रंजीत सिंह ब्रह्मपुरा ने तीन तख्त साहिबान से मार्च शुरू करने पर एतराज प्रकट किया है। ब्रह्मपुरा ने आरोप लगाया कि बादल परिवार ने एसजीपीसी, श्री अकाल तख्त साहिब और शिअद के सम्मान को ठेस पहुंचाई है। अखिल भारतीय सिख संगठन के मुखिया मंजीत सिंह भोमा ने सुखबीर बादल द्वारा श्री अकाल तख्त साहिब का प्रयोग करने पर हैरानी जताई है।
पहली बार किसी आंदोलन में सड़क पर उतरीं हरसिमरत
अमृतसर। मोदी सरकार में छह वर्ष तक कैबिनेट मंत्री के रूप में सत्ता का सुख भोगने वालीं सांसद हरसिमरत कौर बादल किसी बड़े टकसाली अकाली परिवार की पहली बहू हैं, जो शिअद के किसी बड़े राज्यव्यापी आंदोलन में भाग लेने के लिए सड़कों पर उतरी हैं। हरसिमरत कौर के अब तक के राजनीतिक सफर में किसी आंदोलन में भाग लेने का यह पहला अवसर है। केंद्रीय मंत्रीमंडल उनसे बहुत दूर है, इसलिए वह इस आंदोलन के बहाने प्रदेश की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने की तरफ बढ़ती दिख रहीं हैं।
इससे पहले 2003 में जब तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने प्रकाश सिंह बादल व सुखबीर बादल को भ्रष्टाचार के मामले में जेल में बंद कर दिया था, तब हरसिमरत कौर बादल ने अपनी सास बीबी सुरिंदर कौर के साथ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उस समय टकसालियों में इस बात का रोष था कि अकाली दल की परंपरा अदालत से जमानत लेने के लिए नहीं है। हरसिमरत को कई वरिष्ठ अकाली नेताओं की आलोचना भी सहन करनी पड़ी थी।
पहली बार किसी आंदोलन में सड़क पर उतरीं हरसिमरत
अमृतसर। मोदी सरकार में छह वर्ष तक कैबिनेट मंत्री के रूप में सत्ता का सुख भोगने वालीं सांसद हरसिमरत कौर बादल किसी बड़े टकसाली अकाली परिवार की पहली बहू हैं, जो शिअद के किसी बड़े राज्यव्यापी आंदोलन में भाग लेने के लिए सड़कों पर उतरी हैं। हरसिमरत कौर के अब तक के राजनीतिक सफर में किसी आंदोलन में भाग लेने का यह पहला अवसर है। केंद्रीय मंत्रीमंडल उनसे बहुत दूर है, इसलिए वह इस आंदोलन के बहाने प्रदेश की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने की तरफ बढ़ती दिख रहीं हैं।
इससे पहले 2003 में जब तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने प्रकाश सिंह बादल व सुखबीर बादल को भ्रष्टाचार के मामले में जेल में बंद कर दिया था, तब हरसिमरत कौर बादल ने अपनी सास बीबी सुरिंदर कौर के साथ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उस समय टकसालियों में इस बात का रोष था कि अकाली दल की परंपरा अदालत से जमानत लेने के लिए नहीं है। हरसिमरत को कई वरिष्ठ अकाली नेताओं की आलोचना भी सहन करनी पड़ी थी।