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वेंटिलेटर नहीं मिला, तीन माह की परी ने दम तोड़ा
ब्यूरो/अमर उजाला, अमृतसर
Updated Tue, 04 Aug 2015 10:12 PM IST
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गुरु नानक देव अस्पताल में वेंटिलेटर के अभाव में तीन माह की बच्ची की मौत हो गई। बच्ची की मौत के बाद उसकी मां की हालत भी गंभीर हो गई। वहीं अस्पताल के मुताबिक, अस्पताल में सभी वेंटीलेटर बुक हैं।
कस्बा कादियां के गांव ठीकरीवाल निवासी विजय ने बताया कि तीन माह पहले उनकी पत्नी सुनीता ने बच्ची को जन्म दिया था। कुछ दिन बाद ही अचानक बच्ची परी की सांसें उखड़ने लगीं।
उन्होंने गांव के ही एक निजी अस्पताल में दिखाया तो डॉक्टरों ने उसे दाखिल कर दिया। वहां रोजाना हजारों रुपये खर्च हो रहे थे। कुछ दिन तक तो यहां उपचार करवाया, मगर वह दिहाड़ीदार है इसलिए ज्यादा पैसा खर्च करना उनके लिए मुश्किल हो रहा था वे बेटी को लेकर गुरु नानक देव अस्पताल चला गया।
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यहां बेबे नानकी मदर एंड चाइल्ड केयर सेंटर के वार्ड नंबर 3 में बच्ची को दाखिल किया गया। चार दिन तक उसकी बेटी परी दर्द से तड़पती रही, पर डॉक्टरों ने उसे वेंटिलेटर पर नहीं रखा।
डॉक्टर एक ही बात दोहराते रहे कि उनके पास जितने भी वेंटिलेटर हैं, उन पर दूसरे बच्चों को रखा गया है। मंगलवार सुबह अचानक परी का चेहरा लाल हो गया और वह रोने लगी। वे उसे नेकर पीडियाट्रिक वार्ड के डॉक्टर के पास पहुंचे।
वहां भी डॉक्टर ने यही दोहराया कि उनके पास वेंटिलेटर नहीं है। डॉक्टर ने उन्हें एक एंबुबैग पकड़ा दिया और कहा इसे पुश करो। इसका प्रयोग कृत्रिम सांस देने में किया जाता है। इसके बाद न डॉक्टर ने मदद की और न ही किसी स्टाफ नर्स ने। बच्ची की हालत बिगड़ती गई और उसकी मौत हो गई।
वार्ड में जितने भी वेंटिलेटर हैं, उन पर पहले से ही बच्चों को रखा गया था। बच्चों की संख्या ज्यादा होने के कारण सभी को वेंटिलेटर पर नहीं रखा जा सकता।
डॉ. एमएस पन्नू, हेड, पीडियाट्रिक विभाग, जीएनडी अस्पताल
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कस्बा कादियां के गांव ठीकरीवाल निवासी विजय ने बताया कि तीन माह पहले उनकी पत्नी सुनीता ने बच्ची को जन्म दिया था। कुछ दिन बाद ही अचानक बच्ची परी की सांसें उखड़ने लगीं।
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उन्होंने गांव के ही एक निजी अस्पताल में दिखाया तो डॉक्टरों ने उसे दाखिल कर दिया। वहां रोजाना हजारों रुपये खर्च हो रहे थे। कुछ दिन तक तो यहां उपचार करवाया, मगर वह दिहाड़ीदार है इसलिए ज्यादा पैसा खर्च करना उनके लिए मुश्किल हो रहा था वे बेटी को लेकर गुरु नानक देव अस्पताल चला गया।
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यहां बेबे नानकी मदर एंड चाइल्ड केयर सेंटर के वार्ड नंबर 3 में बच्ची को दाखिल किया गया। चार दिन तक उसकी बेटी परी दर्द से तड़पती रही, पर डॉक्टरों ने उसे वेंटिलेटर पर नहीं रखा।
डॉक्टर एक ही बात दोहराते रहे कि उनके पास जितने भी वेंटिलेटर हैं, उन पर दूसरे बच्चों को रखा गया है। मंगलवार सुबह अचानक परी का चेहरा लाल हो गया और वह रोने लगी। वे उसे नेकर पीडियाट्रिक वार्ड के डॉक्टर के पास पहुंचे।
वहां भी डॉक्टर ने यही दोहराया कि उनके पास वेंटिलेटर नहीं है। डॉक्टर ने उन्हें एक एंबुबैग पकड़ा दिया और कहा इसे पुश करो। इसका प्रयोग कृत्रिम सांस देने में किया जाता है। इसके बाद न डॉक्टर ने मदद की और न ही किसी स्टाफ नर्स ने। बच्ची की हालत बिगड़ती गई और उसकी मौत हो गई।
वार्ड में जितने भी वेंटिलेटर हैं, उन पर पहले से ही बच्चों को रखा गया था। बच्चों की संख्या ज्यादा होने के कारण सभी को वेंटिलेटर पर नहीं रखा जा सकता।
डॉ. एमएस पन्नू, हेड, पीडियाट्रिक विभाग, जीएनडी अस्पताल