देश-दुनिया में सर्वविद्या की राजधानी के रूप में विख्यात काशी में गुरु-शिष्य परंपरा का इतिहास अत्यंत प्राचीन और समृद्ध है। यह परंपरा आज भी उसी रूप में वेद विद्यालयों और संस्कृत महाविद्यालयों में जिंदा है। हालांकि बदलते दौर के साथ बहुत कुछ बदलता गया लेकिन गुरु-शिष्य की परंपरा आज भी उसी रूप में नजर आती है। आगे की स्लाइड्स में जानिए..
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- फोटो : amar ujala
वाराणसी के मणिकर्णिका घाट स्थित श्री भगवान विष्णु स्वामी सतुआ बाबा संस्कृत महाविद्यालय में बटुक गुरु-शिष्य परंपरा के तहत वेद, कर्मकांड, ज्योतिष और व्याकरण का अध्ययन करते हैं।
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यहां व्याकरण के शिक्षक नीरज शर्मा ने बताया कि रोजाना सांध्योपासना के साथ बटुकों की जीवनचर्या आरंभ होती है और वेद अध्ययन के साथ उसका समापन होता है। काशी के लगभग सभी वेद विद्यालयों में बटुकों की यही दिनचर्या है।
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सतुआ बाबा आश्रम के पीठाधीश्वर संतोष दास महाराज का कहना है कि जब वह 20 साल पहले इस शहर में आए थे। उनकी कोई पहचान नहीं थी। उनके पास कोई ठिकाना नहीं था। गुरु-शिष्य की परंपरा की ही देन है कि मैं आज भी संत समाज की सेवा और वैदिक ज्ञान के प्रचार-प्रसार में जुटा हूं। मुझे जो मेरे गुरु ने दिया, मैं उसी को अपने शिष्यों को लौटाने का प्रयास कर रहा हूं।
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सतुआ बाबा आश्रम के पीठाधीश्वर संतोष दास महाराज का कहना है कि जब वह 20 साल पहले इस शहर में आए थे। उनकी कोई पहचान नहीं थी। उनके पास कोई ठिकाना नहीं था। गुरु-शिष्य की परंपरा की ही देन है कि मैं आज भी संत समाज की सेवा और वैदिक ज्ञान के प्रचार-प्रसार में जुटा हूं। मुझे जो मेरे गुरु ने दिया, मैं उसी को अपने शिष्यों को लौटाने का प्रयास कर रहा हूं।