शिव की प्रिय नगरी काशी। अविमुक्त क्षेत्र काशी। भगवान शिव यहां स्वयं पार्वती के साथ राज राजेश्वर स्वरूप में विराजमान हैं। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख श्री काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग में शिव और शक्ति दोनों विराजते हैं और ऐसा अद्भुत संयोग दुनिया में कहीं नहीं है। मान्यता है कि बाबा विश्वनाथ काशी में गुरु और राजा के रूप में विराजते हैं। अगली स्लाइड पर क्लिक कर देखें...।
श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास के पूर्व अध्यक्ष आचार्य अशोक द्विवेदी का कहना है यह दुनिया का इकलौता मंदिर है, जिनको निष्कल ब्रह्म विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग आदि विश्वेश्वर कहा जाता है। इस शब्द की पुष्टि सुप्रीम कोर्ट ने भी की है। प्रदेश विधानसभा में पारित अधिनियम 83 भारत के संविधान के अंतर्गत राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से प्रमाणित है।
अधिनियम में ही बताया गया है कि श्री काशी विश्वनाथ प्रचलित व प्रसिद्ध नाम है। बाबा के मंदिर का गुंबद श्रीयंत्र से मंडित है। बाबा विश्वनाथ के दरबार में चार प्रमुख द्वार हैं। शांति द्वार, कला द्वार, प्रतिष्ठा द्वार और निवृत्ति द्वार। पूरी दुनिया में यही एक ऐसा स्थान है, जहां शिवशक्ति एक साथ विराजमान हैं और तंत्र द्वार भी है।
सबसे खास बात यह है कि गर्भ गृह में ज्योतिर्लिंग ईशान कोण में विराजमान हैं और मंदिर का मुख्य द्वार दक्षिण दिशा की ओर है। इससे यहां प्रवेश करने वाले श्रद्धालु बाबा के अघोर रूप के दर्शन करते हैं और समस्त पापों से मुक्त हो जाते हैं। मान्यता है कि बाबा विश्वनाथ काशी में गुरु और राजा के रूप में विराजते हैं। दिन में वह काशी में गुरु रूप और रात नौ बजे अपनी शृंगार आरती के बाद राजवेश में भ्रमण करते हैं। यही वजह है कि यहां शिव को राजराजेश्वर भी कहा जाता है।
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श्री काशी विश्वनाथ मंदिर।
- फोटो : अमर उजाला।
वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ भट्टाचार्या ने बताया कि अनादिकाल से बाबा काशी में विराज रहे हैं। धर्मग्रंथों में महाभारत काल से भी पहले का वर्णन मिलता है। इतिहास की किताबों में 11 से 15वीं सदी के कालखंड में मंदिरों का जिक्र और उसके विध्वंस की बातें भी सामने आती हैं। मोहम्मद तुगलक 1325 ई. के समकालीन लेखक जिनप्रभ सूरी ने किताब विविध कल्प तीर्थ में लिखा है कि बाबा विश्वनाथ को देव क्षेत्र कहा जाता था। लेखक फ्यूरर ने भी काशी के इतिहास को समेटा है। 1460 में वाचस्पति ने अपनी पुस्तक तीर्थ चिंतामणि में मंदिर को लेकर वर्णन किया है।