वाराणसी में गंगा पार रेती में लाखों रुपये की लागत से बनी नहर गंगा के पानी में समा रही है। शुक्रवार को नहर का अधिकांश हिस्सा धीरे-धीरे समाहित हो गया। गंगा के जलस्तर में बढ़ाव जारी रहा तो 1195 लाख रुपये की लागत वाली नहर पूरी तरह समाहित हो जाएगी। काशी के नदी विज्ञानियों ने नहर निर्माण से पहले ही ऐसी आशंका जताई थी।
वाराणसी: गंगा पार 1195 लाख से बनाई गई रेत की नहर समा रही पानी में, चेतावनी के बाद भी हुआ था निर्माण
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बताया गया था कि नहर और गंगा के बीच बालू पर आईलैंड बनाया जाएगा, जिसका लुत्फ पर्यटक उठा सकेंगे। लेकिन, अब नहर धीरे-धीरे गंगा में समाहित हो रही है। संकट मोचन फाउंडेशन के अध्यक्ष व आईआईटी बीएचयू के प्रो. विश्वंभर नाथ मिश्र ने नहर निर्माण के दौरान कहा था कि इससे डाउनस्ट्रीम में कटान बढ़ेगी। पश्चिम में सिल्ट का जमाव होगा। नहर बाढ़ में समाहित हो जाएगी। लेकिन जिला प्रशासन ने उनकी बातों को अनदेखा कर दिया। नदी विज्ञानी प्रो. यूके चौधरी ने भी नहर निर्माण पर सवाल उठाते हुए पीएम और सीएम को भी पत्र लिखा था।
नदी विशेषज्ञ ने दर्ज कराई थी शिकायत
बीएचयू के नदी विशेषज्ञ प्रो. यूके चौधरी ने नहर परियोजना पर सवाल खड़ा करते हुए पीएम नरेंद्र मोदी और सीएम योगी आदित्यनाथ को खत भेजा था। प्रो. चौधरी ने सवाल किया था कि रेत पर नहर में डिस्चार्ज की गणना कैसे की गई? क्रॉस सेक्शन और ढलान कैसे तय हुआ? रेत में रिसाव की दर की गणना कैसे की गई? उन्होंने दावा किया था कि नहर निर्माण के कारण गंगा घाटों से भी दूर हो जाएगी।
कम हो जाएगा गंगा का वेग
प्रो. यूके चौधरी ने बताया कि नहर बाढ़ के पानी की गति को नहीं झेल पाएगी, क्योंकि यह बगैर वैज्ञानिक सिद्धांतों के बनाई गई है। नहर बनने के बाद गंगा में पानी की गहराई कम होने लगेगी। इसके चलते वेग में कमी आएगी। तब गंगा घाटों के किनारे बड़े पैमाने पर गाद जमा होगी। इससे गंगा घाटों को छोड़ देगी। ललिता घाट पर निर्माणाधीन दीवार के कारण अभी से घाटों का प्रवाह कम हो गया है।
मानक के अनुसार डिजाइन नहीं
प्रो. चौधरी ने बताया कि गंगा पार रेती पर बनने वाली नहर की डिजाइन भी मानक के मुताबिक नहीं है। बालू क्षेत्र में नहर का डिस्चार्ज और स्लोप कितना है इसकी जानकारी किसी को नहीं दी गई। गंगा के सात किलोमीटर के दायरे में तीन तरह का बालू मिलता है।