सोनभद्र की हवा, मिट्टी, पानी में प्रदूषण का जहर बढ़ता जा रहा है। 24 से अधिक गांवों में फ्लोराइड जनित फ्लोरोसिस बीमारी तीन पीढ़ियों से विकलांगता बांट रही है। वहीं मरकरी और आर्सेनिक जैसे खतरनाक तत्वों की बढ़ती मात्रा तेजी से लोगों को बीमार बना रही है। इसको लेकर कई शोध हुए। जिसके बाद एनजीटी ने वहां की इंडस्ट्री को आगाह भी किया था। लेकिन कोई फर्क ना पड़ने के बाद अब मरकरी की ज्यादा मात्रा उत्सर्जित करने के लिए आदित्य बिड़ला ग्रुप की ग्रासिम इंडस्ट्री पर नेशनल ग्रीन ट्रीब्यूनल (NGT) एक करोड़ का जुर्माना लगाया है। पढ़ें आगे की स्लाइड्स में..
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अस्थि रोग से पीड़ित ग्रामीण
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हवा, मिट्टी, पानी में बढ़ते प्रदूषण के चलते जहां सिंगरौली परिक्षेत्र (सोनभद्र,सिंगरौली और म्योरपुर का औद्योगिक अंचल) को देश का तीसरा सर्वाधिक प्रदूषित क्षेत्र माना जा चुका है। वहीं पर्यावरण विशेषज्ञ मरकरी की अधिकता को देखते हुए अपने बोलचाल में इस एरिया को 'भारत का मिनिमाटा' (मरकरी के चलते तबाह हुआ जापान का शहर) की संज्ञा देने लगे हैं। फ्लोराइड की अधिकता और इसके चलते दुद्धी, चोपन, म्योरपुर और बभनी ब्लाक के गांवों में विकलांग होती पीढ़ी को लेकर 20 साल पहले ही खुलासा हो गया था। तब से अब तक प्रभावी राहत के नाम पर ज्यादातर कागजी घोड़े ही दौड़ाए गए। इस दंश से निजात मिलती, इससे पहले 2012 में सीएसई ने सोनभद्र के रग-रग में पारे की मौजूदगी का खुलासा कर खलबली मचा दी।
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पीड़ित ग्रामीण
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लखनऊ में प्रेस कांफ्रेंस कर बताया गया कि हवा, मिट्टी, पानी के साथ पशु, पक्षी, जानवर, पौधे सभी में मरकरी पैबस्त हो चुकी है। इसके बाद भी जिम्मेदार नियंत्रण के उपाय बनाने की बजाय इसे झुठलाने में लगे रहे। एनजीटी के निर्देश पर 2015 में कोर कमेटी ने जब विस्तृत अध्ययन किया तो यहां के वायुमंडल में हर दिन 14 किलो पारा घुलने की रिपोर्ट देकर सरकारी तंत्र को सोचने पर विवश कर दिया। हालात को देखते हुए सड़क मार्ग से कोयला ढुलाई रोकने, फ्लोराइड के विस्तृत अध्ययन के लिए दो केंद्र स्थापित करने, चिकित्सकों को विशेष ट्रेनिंग देने, अत्याधुनिक अस्पताल स्थापित करने जैसे कई सुझाव दिए गए।
2018 में एनजीटी ने इसके पालन के लिए स्पष्ट निर्देश भी जारी किए। नियमित निगरानी के लिए ओवरसाइट कमेटी गठित की। बावजूद एक भी सुझाव पर अब तक प्रभावी अमल नहीं हो पाया है। एनजीटी की सख्ती के बाद प्रभावित ग्रामीणों को शुद्ध पेयजल के लिए आरओ प्लांट तो लगाए गए लेकिन पानी का बड़ा हिस्सा बर्बाद होने, अत्यधिक जल दोहन से बढ़ते प्रदूषण को रोकने को लेकर कोई उपाय अमल में नहीं लाए गए। अब जाकर नेशनल ग्रीन ट्रीब्यूनल (NGT) ने आदित्य बिड़ला ग्रुप की ग्रासिम इंडस्ट्री पर एक करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया है।
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पीड़ित ग्रामीण
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क्रशर प्लांट भी प्रदूषण का बड़ा कारक बने हुए हैं। खनन स्थल पर पौधरोपण, गिट्टी क्रस करते समय पानी छिड़काव आदि मानक निर्धारित किए गए हैं लेकिन शायद ही किसी क्रशर प्लांट पर इसका पालन होता नजर आता है। हालत यह है कि वाराणसी-शक्तिनगर मार्ग पर डाला और बग्घानाला-ओबरा मार्ग पर तपिश में भी कोहरे की स्थिति बनी रहती है। यहां से बाइक, साइकिल या पैदल गुजरने वालों का शरीर ही सफेद रंग में पुत जाता है। सांस संबंधी बीमारियां भी यहां तेजी से बढ़ रही हैं।