कहा जाता है कि किताबें इंसानों की सबसे अच्छी दोस्त होती हैं। जैसे व्यक्ति अपने मित्र का हर पल, हर घड़ी, हर मुश्किल में साथ देता है, वैसे ही किताबें भी हर विषम परिस्थिति में मनुष्य का मार्गदर्शन करती हैं। इन्हीं किताबों में हर मुश्किल सवाल, परिस्थिति का हल छिपा होता है। किताबों से भरे उस कमरे को जिसे पुस्तकालय कहा जाता है। इसमें सरस्वती के अनंत वरद पुत्रों की कृतियों का संग्रह होता है, जहां से सभी प्रकार के ग्रंथ सरलता और सुगमता से उपलब्ध हो जाते हैं।
आइए हम आपको बताते हैं गाजीपुर जिले के बहरियाबाद कस्बा स्थित मजहर मेमोरियल उर्दू लाइब्रेरी में जहां विभिन्न भाषाओं की हजारों पुस्तकें मौजूद हैं। इस पुस्तकालय की स्थापना स्थानीय कस्बा निवासी एहतेशामुद्दीन सिद्दीकी ने पंद्रह अगस्त वर्ष 1978 को चंद किताबों से की, जो आज पुष्पित पल्लवित होकर एक प्रतिष्ठित पुस्तकालय के रूप में अपनी सेवा प्रदान कर रहा है। 1264 सदस्यों वाले इस पुस्तकालय में 34631 पुस्तकें हैं, जिनमें हिंदी की 11317, उर्दू की 16210, अंग्रेजी की 3152,.पांडुलिपियां 1007, अन्य 2945 पुस्तकें हैं।
पुस्तकालय के खुलने का समय 11 से शाम पांच बजे तक। यहां वर्ष में लगभग 200 पुस्तकें आ जाती हैं। पुस्तकों की उपलब्धता तथा रख-रखाव के फंड की व्यवस्था केवल प्रबंध समिति के सदस्यों के सहयोग पर ही निर्भर है। इस पुस्तकालय में शैशवावस्था से लेकर आज तक काफी परिवर्तन हुए। श्री सिद्दीकी द्वारा एक कमरे में रखी तीनआलमारियों में पुस्तकों को रखकर प्रारंभ हुए इस पुस्तकालय का अपना भवन है। जिसमें अलग-अलग भाषा की पुस्तकों के लिए इसे कई भागों में बाटा गया है।
एक भाग को वाचनालय के रूप में प्रयोग किया जाता है। पूर्व के वर्षों की अपेक्षा वर्तमान में लोगों के अंदर पुस्तकालयों के प्रति उदासीनता आई है, इसका बड़ा कारण है सोशल मीडिया है। अधिकांश जानकारी लोगों को सोशल मीडिया पर घर बैठे मिल जाती है, यही कारण है कि अब पुस्तकालय में पहले की तरह किताबें पढ़ने वालों का जमघट नहीं लगता।
इस संबंध में पुस्तकालय के सचिव एहतेशामुद्दीन सिद्दीकी ने कहा कि पुस्तकालय की समुचित व्यवस्था के लिए शासकीय सहायता एवं आधुनिकीकरण की व्यवस्था की आवश्यकता है। शासन की ओर से पुस्तकालयों को नवीन पुस्तकें उपलब्ध कराने के साथ ही कम से कम तीन कर्मचारी की नियुक्ति की जानी चाहिए। लेकिन इस दिशा में कोई पहल नहीं कर रहा है।