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इस मंदिर में हर साल बढ़ता है शिवलिंग का आकार, पढ़ें कुछ ऐसे ही शिवालयों की रोचक बातें

Mon, 04 Mar 2019 03:46 PM IST
Sayali Maurya न्यूज डेस्क,अमर उजाला,वाराणसी
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,वाराणसी Published by: Sayali Maurya Updated Mon, 04 Mar 2019 03:46 PM IST
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Mahashivaratri historical shiv temples in purvanchal
shiv temple - फोटो : amar ujala

देवों के देव महादेव का विशेष पर्व महाशिवरात्रि पर व्रत और पूजन का विशेष महत्व है। इसके साथ ही हर क्षेत्र का अपना प्रमुख शिव स्थान और शिवालय है, जिसका अपना एक खास इतिहास है। जैसे महादेव की नगरी में काशी विश्वनाथ और कैथी स्थित मार्कंडेय महादेव मंदिर की प्राचीन मान्यता है, वैसे ही पूर्वांचल के मऊ, जौनपुर, चंदौली, आजमगढ़ समेत कई जिलों में ऐसे एतिहासिक शिव स्थान है, जिनके बारे में आपने नहीं सुना होगा। आइए जानते है कुछ ऐसे ही प्रमुख शिवालयों के बारे में, देखें आगे की स्लाइड्स में...

Mahashivaratri historical shiv temples in purvanchal
shiv temple - फोटो : amar ujala

मऊ जिले के दोहरीघाट कस्बा स्थित ऐतिहासिक व पौराणिक स्थल दोहरीघाट के गौरीशंकर घाट पर स्थापित शिव मंदिर आज भी आस्था का केंद्र है। मान्यता है कि शिवरात्रि के दिन जलाभिषेक करने से सभी मनोकामना पूरी हो जाती है। इसका इतिहास है कि दो हरी यानी राम और परशुराम के मिलन से दोहरीघाट नगर का नाम पड़ा। जब प्रभु श्रीराम सीता स्वयंवर से अयोध्या आ रहे थे। उसी समय शिव धनुष टूटने से क्रोधित परशुराम राम से मिलने के लिए आ रहे थे। इसी स्थान पर राम और परशुराम का मिलन हुआ था। राम परशुराम का यहीं पर संवाद हुआ। परशुराम के कहने पर प्रभु राम ने एक शिवलिंग की स्थापना की। शिवलिंग के बगल मे मां पार्वती (गौरी) की भी स्थापना हुई। कालांतर में उस स्थान का नाम गौरीशंकर घाट पड़ा। शिवलिंग की विशेषता है कि यह बिना अरघे का है। 

Mahashivaratri historical shiv temples in purvanchal
shiv temple - फोटो : amar ujala

ऐसे ही जौनपुर में जौनपुर-गाजीपुर मार्ग पर सिहौली केराकत में गोमती नदी के उत्तरी तट पर स्थित इस गोमतेश्वर महादेव मंदिर 44 वर्ष पुराना है। यहां जौनपुर के अलावा गाजीपुर, आजमगढ़ व वाराणसी से भी श्रद्धालु आते हैं। वर्ष 1974 में सावन माह में गांव के ही दलथम्मन यादव के खेत में पुल्लू चौहान जुताई कर रहे थे। हल किसी वस्तु से टकारकर रुक गया। वहां पर खुदाई करने पर शिवलिंग मिला। स्वयंभू शिवलिंग को स्थापित करके उसकी पूजा होने लगी। वहीं, धर्मापुर क्षेत्र में एक ऐतिहासिक शिव मंदिर है, जिसका निर्माण जौनपुर के राजा द्वारा करवाया गया था। इस मंदिर के किनारे-किनारे बनी सुंदर झील और गेट पर खड़ी दो सुंदर मूर्तियां इसके प्राचीनता को शाही अंदाज में दर्शाती है। इसके अलावा जौनपुर में त्रिलोचन महादेव, सुजानगंज के गौरीशंकर धाम, मछलीशहर के दियावा महादेव आदि शिवालय प्रमुख हैं।  

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Mahashivaratri historical shiv temples in purvanchal
shiv temple - फोटो : amar ujala

चंदौली जिले के शिकारगंज क्षेत्र के बाबा जागेश्वरनाथ धाम में स्थित स्वयंभू शिवलिंग से चंद्रप्रभा नदी के कछार पर स्थित शीतल कुंड का जुड़ाव हैं। इस कुंड का जल हमेशा स्वच्छ रहता है। वहीं शिकारगंज के हेतिमपुर गांव में याज्ञवलक्य की तपोभूमि स्थित बाबा जागेश्वरनाथ शिवालय डुगडुगवा व हथिनिया पहाड़ की छांव में एक चर्चित शिवालय है। यह वाराणसी के गजेटियर में उल्लेखित है। स्वयंभू शिवलिंग का झुकाव सीधे तौर पर बनारस के बाबा विश्वनाथ की तरफ इशारा करता है। साथ ही माना जाता है कि स्वयंभू शिवलिंग एक जौ के बराबर प्रतिवर्ष बढ़ते है। मंदिर के पश्चिम व उत्तर के मध्य में पांच महंतों की समाधि आज भी विद्यमान है। वहीं, सकलडीहा के बरठी गांव स्थित बाबा कालेश्वर नाथ मंदिर भारत के चंद शिवालयों में से एक है, जिसे राजा बख्त सिंह ने बनवाया था। इस मंदिर पर महाशिवरात्रि पर मेला लगने की परंपरा 250 साल पुरानी है। वर्ष 1765 से पदुमनाथपुर गांव से शिव बरात लगातार निकल रही है। 

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Mahashivaratri historical shiv temples in purvanchal
shiv temple - फोटो : amar ujala

आजमगढ़ के महराजगंज स्थित भैरोबाबा धाम और नगर के भंवरनाथ मंदिर सभी शिव मंदिरों में प्रमुख है। यहां पर हर महाशिवरात्रि और सावन में बाबा को जल चढ़ाने के लिए भोर से लोगों की भीड़ जमा रहती है। शिवरात्रि को लेकर नगर के भवरनाथ मंदिर को पूजा समिति द्वारा आकर्षक ढ़ंग से सजाया जाता है। वहीं, शहर में गौरीशंकर घाट और पुराना पुल के पास से शिव बरात भी निकालने की परंपरा है।

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