जगाय हारी भोले बाबा ना जागे, गंगा जगावें, यमुना जगावें, त्रिवेणी जगावें लहर मारी, भोले बाबा ना जागे जगाय हारी... की मधुर तान पर विश्व के नाथ जब नींद से जागते हैं तो सबसे पहला भोग दूध का लगाया जाता है। मंगला आरती के साथ काशी के दिन की शुरुआत होती है। इसके साथ ही शिव की नगरी उनके रंग में रंग जाती है। मंगला आरती से शुरू हुआ सिलसिला शयन आरती पर विश्राम लेता है।
मंगला आरती से काशी की सुबह आरंभ हो जाती है। रात में 2:45 बजे से मंगला आरती के अनुष्ठान शुरू होते हैं और तीन से चार बजे तक आरती का समय निर्धारित है। मंगला आरती के लिए श्रद्धालु दो बजे से ही मंदिर में प्रवेश करने लगते हैं। आरती के लिए पांच सौ रुपये शुल्क निर्धारित है। आरती से पहले गर्भगृह से रात के शृंगार को हटाया जाता है। उसके बाद उनके खड़ाऊं, पलंग, दूध के पात्र हटाए जाते हैं। बाबा जब नींद से जागते हैं तो सबसे पहले उन्हें दूध का भोग लगाया जाता है। इसके बाद उन्हें जल, दूध, घी, दही, शहद और पंचामृत से स्नान कराया जाता है। षोडशोपचार विधि से पूजन के बाद फूलों से शृंगार कर बाबा को भस्म अर्पित कर आरती उतारी जाती है। आरती के बाद मंदिर के कपाट आम श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए जाते हैं। मंगला आरती में बाबा विश्वनाथ से पूरे ब्रह्मांड के कल्याण और मंगल की प्रार्थना की जाती है। बाबा का ये स्वरूप मंगलकारी होता है। मंगला आरती के बाद बाबा पुनः औघड़दानी बनकर महाश्मशान चले जाते हैं।
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बाबा काशी विश्वनाथ
- फोटो : अमर उजाला
भोग ग्रहण करने के बाद बाबा खुद शामिल होते हैं सप्तर्षि आरती में
मंगला आरती के बाद बाबा की मध्याह्न भोग आरती दिन में 11:15 बजे से आरंभ होती है। इस आरती के दौरान बाबा विश्वनाथ को पंचामृत से स्नान कराया जाता है, ताकि सृष्टि अन्न, धन और परोपकार से फलती-फूलती रहे। इसके बाद भव्य शृंगार होता है। उन्हें फल, फूल, मेवा, दही, मिष्ठान, दूध और भांग का भोग लगाया जाता है। भगवान भोग ग्रहण करने के लिए खुद इस आरती में शामिल होते हैं। अगस्तकुंडा में श्री नाटकोट क्षेत्रम ट्रस्ट में बाबा दरबार को जाने वाली डलिया सजाई जाती है और दिन में 11 बजे और रात 8 बजे ब्राह्मण दल इसे मंदिर ले जाते हैं। चांदी की डलिया में बाबा का भोग होता है तो दूसरी डलिया में पूजा की सामग्रियां। चांदी के घड़े में गंगाजल और एक बक्से में पूजन की अन्य सामग्रियां होती हैं। इन डलियों में बाबा के भोग के लिए फल, फूल, मिष्ठान्न, दूध, जनेऊ, अक्षत, चंदन, भष्मी, रोली, सिंदूर, इत्र और 101 माला होती है। पीतल की आरती कंधे पर रखकर ये आरती दल बाबा दरबार के लिए निकलते हैंं। इस आरती में गुग्गुल-दशांग कपूर का उपयोग रास्ते भर होता है। वाद्ययंत्रों को बजाते हुए सभी विश्वनाथ मंदिर जाते हैं तो जनता भी नमन करती है।
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काशी विश्वनाथ मंदिर के शयन आरती के दर्शन
- फोटो : अमर उजाला
अलग-अलग गोत्र के ब्राह्मण करते हैं सप्तर्षि आरती
काशी विश्वनाथ मंदिर में बाबा की सप्तर्षि आरती शाम को होती है। हर कोई इसका साक्षी बनना चाहता है। सप्तर्षि आरती का समय शाम को 6:45 बजे से 8:15 बजे तक होता है। इस आरती को अलग-अलग क्षेत्र के सात ऋषि या ब्राह्मण करते हैं, जो अलग-अलग गोत्र के होते हैं। ये सभी ऋषि अलग-अलग रास्ते से डोली लेकर बाबा के मंदिर पहुंचते हैं। सप्तऋषि आरती में बाबा को प्रिय भांग, ठंडाई के अलावा और भी बनारसी व्यंजन का भोग लगाया जाता है। फिर सभी सात ऋषि उनकी आरती करते हैं।
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शृंगार कर विशेष आरती
- फोटो : अमर उजाला
शृंगार व भोग आरती के बाद करते हैं विश्राम
रात्रि में शृंगार व भोग आरती के बाद बाबा विश्राम करते हैं। इसके लिए रात्रि में नौ बजे से 10:15 बजे तक का समय निर्धारित है। मध्याह्न भोग आरती की तरह ही रात्रि की भोग आरती की परंपरा निभाई जाती है।
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शयन आरती में बाबा विश्वनाथ को ओढाई गई रजाई
- फोटो : सोशल मीडिया
बगैर शयन आरती के अधूरा है काशीवासियों का दिन
बाबा के शयन आरती के बगैर काशीवासियों का दिन अधूरा होता है। बाबा की शयन आरती की खास बात है कि इसमें शामिल होने वाले खुद ब खुद खींचे चले आते हैं। शयन आरती 10:30 बजे शुरू होती है और 11 बजे समाप्त हो जाती है। इस आरती में काशीवासी विशेष गीत गाकर बाबा को सुलाते हैं। शयन आरती में गर्भगृह में उनकी चांदी की पालकी लगाई जाती है और उस पर कपड़े बिछाए जाते हैं। इस पर बाबा का खड़ाऊ रखा जाता है। मान्यता है कि इसी चांदी की पालकी पर बाबा विश्वनाथ विश्राम करते हैं। शृंगार आरती के बाद शयन आरती शुरू होती है और इसके बाद बाबा के कपाट बंद हो जाता है। अगले दिन फिर भोर में मंगला आरती के समय बाबा के कपाट खुलते हैं।