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काशी का ‘गुरुकुल': यहां छात्राओं को शास्त्र के साथ शस्त्र चलाने का भी मिलता है प्रशिक्षण

Wed, 06 Sep 2017 02:20 PM IST
ब्यूरो,अमर उजाला,वाराणसी
ब्यूरो,अमर उजाला,वाराणसी Updated Wed, 06 Sep 2017 02:20 PM IST
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kashi gurukul girl student learn vedas and weapon training
gurukul - फोटो : अमर उजाला
काशी में एक ऐसा ‘गुरुकुल’ भी है जो आधुनिकता की आबोहवा के बीच वैदिक युगीन शिक्षा और गुरु-शिष्य परंपरा की मिसाल है। करीब 40 साल पहले स्थापित इस केंद्र में वर्तमान देश के विभिन्न राज्यों के अलावा नेपाल, रूस जैसे देशों की 150 से अधिक छात्राएं शिक्षा ग्रहण कर रही हैं। आगे की स्लाइड्स में जानिए इस ‘गुरुकुल’ को... 

 
kashi gurukul girl student learn vedas and weapon training
gurukul - फोटो : अमर उजाला
महमूरगंज स्थित पाणिनी कन्या महाविद्यालय में शिक्षा के साथ ही छात्राएं सुयोग्य गुरु के सानिध्य में दीक्षा भी लेती हैं। ये छात्राएं यज्ञोपवीत धारण करती हैं और प्रतिदिन आचार्या के कुशल निर्देशन में शास्त्र के साथ ही शस्त्र चलाकर आत्मरक्षा का प्रशिक्षण भी दिया जाता है। इन्हें प्रथमा, मध्यमा से लेकर शास्त्री आचार्य तक की शिक्षा दी जाती है।
 
kashi gurukul girl student learn vedas and weapon training
gurukul - फोटो : अमर उजाला
 छात्राओं को वेदों के सस्वर पाठ, शास्त्रीय गायन के साथ ही लाठी, तलवार, भाला, जूडो, धनुष विद्या का भी आदि का नियमित अभ्यास कराया जाता है। खासियत यह है कि यहां सिर्फ छात्राओं का ही प्रवेश लिया जाता है और विद्वान वेदपाठी महिलाएं ही उनकी गुरु होती हैं। साल में कुछ महत्वपूर्ण अवसरों पर ही उन्हें परिवारीजनों से मुलाकात का मौका मिल पाता है। 
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gurukul - फोटो : अमर उजाला
पाणिनी कन्या महाविद्यालय में रह कर अध्ययन करने वाली छात्राओं की दिनचर्या भोर में चार बजे से शुरू हो जाती है। 4:30 बजे सामूहिक मंत्रपाठ, 6:30 बजे हवन-पूजन, 7:30 बजे योगासन, नौ से दोपहर 12 बजे और दो से शाम पांच बजे तक कक्षाएं चलती हैं। इसके बाद शाम को 6:30 से 7:30 बजे तक हवन-पूजन, 7.30 बजे से आठ बजे तक सांस्कृतिक पूजन और फिर रात 10 बजे तक शयन।  
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gurukul - फोटो : अमर उजाला
इस गुरुकुल का प्रचार्या डॉ. नंदिता शास्त्री कहती हैं कि शिक्षा प्रणाली में गुरु-शिष्य सानिध्य गुरुकुल में रहकर ही हो सकता है। शिष्य का यह दायित्व है कि वह आचार्य के बताए मार्ग का अनुसरण करे। इस समय शिक्षा के अधिकांश केंद्र अर्थ प्रधान हो गए हैं। ऐसे में वहां विद्या दायित्व का बोध कम ही दिखता है। शिक्षकों की जिम्मेदारी है कि वह दायित्वों का सजगता पूर्वक निर्वहन करें। 
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