आज की महिलाएं पुराने रीति रिवाजों और मिथकों को तोड़कर न सिर्फ आगे बढ़ रही हैं। बल्कि अपने दम पर सफलता के फलक को छू कर लोगों के लिए मिसाल कायम कर रही हैं। राह में मुश्किलें आईं, अपने और परायों ने ताने दिए, अनर्गल बातें कीं, लेकिन उन सब को दरकिनार करते हुए अपने जज्बे, जुनून और जिद के चलते अपने कदम आगे बढ़ाती गईं। ऐसे तमाम उदाहरण दुनिया में हर जगह हैं। फिर भला काशी की नारियों के क्या कहने। यहां की महिलाओं ने अपनी तकदीर अपने दम पर लिखी। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर हम आपको ऐसी ही निडर और परिश्रमी महिलाओं से रूबरू करा रहे हैं। देखें अगली स्लाइड्स...।
मेहनत और हौसले को सलाम: इन महिलाओं ने समाज में बनाई अपनी पहचान, लिखी खुद की तकदीर
कस्बे से निकलकर अभिनय में बनाया मुकाम
छोटे से कस्बे से निकलकर ग्लैमर और रुपहले पर्दे तक आना किसी लड़की या महिला के लिए कतई आसान नहीं है। लेकिन विंध्याचल की सृष्टि भंडारी ने मुश्किलों को दरकिनार करते हुए रंगमच और फिर बॉलीवुड के तौर तरीकों में खुद को ढाला। सृष्टि बताती हैं कि 12वीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद अपने घर से दूर बनारस आकर यहां थिएटर में अभ्यास करना शुरू कर दिया। कड़ी मेहनत और लगन से स्टेज शो व नाटकों में किया अभिनय लोगों को पसंद आने लगा, जिसके बाद उसे ‘सार्थक’ नाम से फीचर फिल्म में काम करने का मौका मिला। 2018 में बनी लघु फिल्म ‘हलाला’ में सृष्टि ने मुख्य भूमिका निभाई। जिसका चयन जयपुर इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल व न्यू दिल्ली फिल्म फेस्टिवल के लिए भी हुआ था। बनारस के साथ सृष्टि ने यूपी के अन्य जिलों के कई प्रोडक्शन हाउस के साथ शार्ट फिल्म, डॉक्यूमेंट्री, म्यूजिक वीडियो कर में काम किया। होली पर सृष्टि की वेब सीरीज रिलीज होने वाली है, जिसमें वह मुख्य महिला किरदार में नजर आएंगी।
हिम्मत और हौसले के सामने बौनी पड़ी दिव्यांगता
कंपोजिट विद्यालय छित्तूपुर की प्रधानाध्यापक व राज्य अध्यापक पुरस्कार विजेता आरती भाटिया ने अपने जोश ओर जुनून से साबित कर दिया कि सफलता किसी सहायता की मोहताज नहीं होती। आरती के लिए उनकी दिव्यांगता उनकी ताकत है। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी विनोद कुमार भाटिया ने अपनी बेटी को दूसरे पर निर्भर होना नहीं सिखाया। आरती ने बच्चों को शिक्षित करने के लिए डॉक्टर की नौकरी छोड़ दी और शिक्षा को चुना। उन्होंने सरकारी विद्यालय की प्रधानाध्यापक के पद पर रहते हुए बच्चों के लिए स्कूल में बुक बैंक तैयार किया है, ताकि आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों की मदद हो सके। स्कूल से आने के बाद आरती घर पर पति राजीव टंडन के साथ ‘बाबा की पाठशाला’ चलाकर आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों व महिलाओं को प्रौढ़ शिक्षा से जोड़ने के साथ उन्हें सिलाई कढ़ाई भी सिखाती हैं।
लॉकडाउन में 300 महिलाओं को बनाया आत्मनिर्भर
शिवपुर क्षेत्र की महिला उद्यमी कुछ समय पहले तक एक सामान्य गृहिणी थीं, लेकिन लॉकडाउन के दौरान भोजन वितरण कर अपने साथ-साथ समाज की 300 महिलाओं को रोजगार से जोड़ दिया। रीता बताती हैं कि लॉकडाउन के दौरान गरीबों में भोजन वितरित करने गई थीं। तब वहां रहने वाली महिलाओं ने मुझसे कहा कि खाना देने से अच्छा है कि हमें कुछ रोजगार दें। उनकी ये बात मेरे दिल को छू गई। मैंने उन्हें रोजगार जोड़ने का मन बना लिया। नागपुर स्थित केंद्र से संपर्क किया गाय के गोबर से बनने वाले उत्पादकों के बारे में जानकारी ली। फिर पहले घर की महिलाओं के साथ एक स्वयं सहायता समूह की शुरुआत की। दीपावली में लगभग आसपास की 300 महिलाएं रीता के साथ जुड़कर आज आत्मनिर्भर बन चुकी हैं।
पहलवानी में पुरुष परंपरा को आगे बढ़ा रही है बेटी
पहलवानी खानदान की परंपरा को आगे बढ़ा रही है कशिश। कुश्ती में कभी दादा, ताया, पिता और चाचा की तूती बोलती थी। मगर अब इसी परंपरा को आगे बढ़ा रही बेटी। कशिश के परिवार में उनके दादा, ताया, पिता और चाचा राष्ट्रीय प्रतियोगिता सहित यूपी, पूर्वांचल और बनारस केसरी का खिताब जीता। अब इसी परंपरा को आगे कशिश ने बढ़ाया है। राष्ट्रीय स्तर तक लड़ चुके पिता विनोद ने दूध बेचकर बेटियों को दंगल गर्ल बनाने की ठानी तो बेटियों ने भी पिता को निराश नहीं किया। हाल ही में मेरठ की महिला पहलवान को पटखनी देकर कशिश यादव ने 61 किलो भार वर्ग में स्वर्ण पदक जीता। जो यूपी कुश्ती संघ की ओर से नोएडा में राज्य स्तरीय सब जूनियर प्रतियोगिता हुई थी। दो बहनों में छोटी साकेत नगर निवासी 16 वर्षीय कशिश अपने पांच वर्ष के कुश्ती कॅरियर में स्कूली स्टेट, जूनियर स्टेट में दो बार स्वर्ण पदक जीत चुकी हैं। इसके अलावा स्कूली नेशनल 2019 में दमखम दिखा चुकी है। जबकि बड़ी बहन काजल पढ़ाई लिखाई में जुटी है। कोरोना काल से पूर्व कशिश सिगरा स्टेडियम में अभ्यास करती थी। अब बीएचयू में कोच हरिराम की निगरानी में अभ्यास करती है। कशिश के चाचा मुकेश यादव का कहना है अभी तक हमारे खानदान में पहलवानी में पुरुषों का वर्चश्व था। मगर अब इस परंपरा को खानदान की बेटी आगे बढ़ा रही है।