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HAPPY BIRTHDAY: शहनाई के जादूगर उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के बारे में खास बातें

Wed, 21 Mar 2018 10:53 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Updated Wed, 21 Mar 2018 10:53 AM IST
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happy birthday of bharat ratna bismillah khan,know the story of legend
बिस्मिल्लाह खां
शहनाई के जादूगर और भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का आज जन्मदिन है। भारत रत्न बिस्मिल्लाह खान का जन्म बिहार प्रदेश के डुमरांव के ठठेरी बाजार में 21 मार्च 1916 को हुआ था। आठ वर्ष की उम्र में वो वाराणसी आ गए और यहां के हो गए। बिस्मिल्लाह खान को वर्ष 2001 में भारत के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया। वह तीसरे भारतीय संगीतकार थे जिन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया है। आगे की स्लाइड्स में जानिए उनके बारे में...
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बिस्मिल्लाह खान - फोटो : ANI
शहनाई के बादशाह भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्ला खान को मोक्षदायिनी गंगा से बेहद लगाव था। वे मानते थे कि उनकी शहनाई के सुरों में जब गंगा की धारा से उठती हवाएं टकराती थीं तो धुन और मनमोहक हो उठती थीं। यही वजह थी कि मुंबई जब बॉलीवुड की शक्ल ले रहा था तो उनके पास हमेशा के लिए वहीं बसने के प्रस्ताव आए, इस पर उस्ताद का एक ही जवाब होता था, अमा यार ले तो जाओगे, लेकिन वहां गंगा कहां से लाओगे।
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उस्ताद बिस्मिल्ला खां - फोटो : ANI

आकाशवाणी और दूरदर्शन पर अल सुबह बजने वाली मंगल ध्वनि उस्ताद बिस्मिला खान की शहनाई की तान है। एक समय था जब इस मंगल ध्वनि से ही पूरे देश की सुबह होती थी। उनके उपर लिखित किताब के मुताबिक, सुबह और शाम के अलग अलग सात रागों को तीन तीन मिनट के लिए मंगल ध्वनि  बजाया गया है। बीते वर्षों में चौदह रागों का यह संग्रह अब आकाशवाणी और दूरदर्शन के मंगल ध्वनि का पर्याय बन चुका है।
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डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम भी थे उस्ताद के मुरीद।
इस्लाम में संगीत की कथित मनाही के बारे में उन्होंने किताब में कहा कि संगीत वह चीज है, जिसमें जात-पात कुछ नहीं है, संगीत किसी मजहब का बुरा नहीं चाहता। मुझे लगता है कि इस्लाम में मौसिकी को इसलिए हराम कहा गया कि अगर इस जादू जगाने वाली कला को रोका न गया, तो एक से एक फनकार इसकी रागनियों में डूबे रहेंगे कि दोपहर शाम की नमाज कजम हो जाएगी।  
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BISMILLAH KHAN - फोटो : SELF

उस्ताद की शहनाई खुशहाली का प्रतीक थी। 15 अगस्त 1947 को देश स्वतंत्र हुआ और उन्मुक्त वातावरण की पहली बयार बही, तो फिजा में उस्ताद की शहनाई की धुन दिल्ली के लालकिले से गूंजी। 26 जनवरी 1950 को जब देश गणतंत्र बना तब तत्कालीन राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद और प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के अनुरोध पर उस्ताद ने मौजूं का इस्तकबाल अपनी खास धुनों से किया। 
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