गुरु पारस को अंतरो, जानत हैं सब संत। वह लोहा कंचन करे, ये करि लेय महंत... गुरु और पारस का अंतर जगत में विख्यात है। पारस के स्पर्श से लोहा स्वर्ण बन जाता है, किंतु गुरु अपने गुण ज्ञान में ढालकर शिष्य को अपने जैसा ही महान बना लेते हैं। धर्म की नगरी काशी में संतों की विशाल श्रृंखला पुष्पित और पल्लवित हुई। देवाधिदेव की काशी में शिष्यों ने गुरु की आज्ञा को सिर माथे रखकर अपने मूल पेशे से जुड़े रहकर परमपिता परमेश्वर के दर्शन किए तो ब्रह्मज्ञान का रस भी पिया। कुछ ऐसे ही गुरु और शिष्यों की कहानी जिन्होंने समाज को बहुत कुछ दिया है। पढ़ें आगे की स्लाइड्स में...
गुरु पूर्णिमा : पढ़ें गुरु-शिष्य की कहानी, उन्हीं की जुबानी
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ज्ञान के सागर से ‘भविष्य’ को लगा रहे पंख :
शहर के युवा मलिन बस्ती के बच्चों का जीवन संवारने में लगे हुए है। कचहरी स्थित टीटीएफ फाउंडेशन एक ऐसी संस्था है, जो 2013 से वाराणसी समेत भदोही, सोनभद्र गाजीपुर व मिर्जापुर में निरक्षर बच्चों को शिक्षित कर रही है। संस्था ने अब तक एक हजार से अधिक बच्चों को शिक्षित किया है। इस संस्था के बच्चों के साथ प्रधानमंत्री अपना जन्मदिन मना चुके है। सदस्यों में मुख्य रूप से यजत, वैभव, रंजीत, अजीत, आयुष, अवनीश है।
गुरु शिष्य की जोड़ी ने बनाया वर्ल्ड रिकॉर्ड :
ब्रेथलेस हनुमान चालीसा सहित चार बार वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने वाले डॉ जगदीश पिल्लई ने अपनी शिष्यों को आगे बढ़ने को हमेशा प्रेरित किया। जिसकी बदौलत काशी विद्यापीठ की छात्रा नेहा सिंह ने भी मोती से भारत का नक्शा बनाकर वर्ल्ड रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज करा चुकी है।
बड़े रामदास की संगीत परंपरा को बढ़ा रहे पंकज :
बनारस घराने के ख्याल गायक बड़े रामदास की संगीत परंपर को पांचवीं पीढ़ी के शास्त्रीय गायक पंकज मिश्रा 27 सालों से आगे बढ़ा रहे हैं। बड़े रामदास, हरिशंकर महाराज, जालपा प्रसाद मिश्र की संगीत परंपरा की शृंखला अनवरत चली आ रही है। शिष्य गुरुकुल परंपरा के तहत सुबह से ही संगीत का रियाज करना शुरू कर देते हैं और देर रात तक संगीत के स्वर गूंजते रहते हैं।
पीएफ के पैसों से बना दिया खेल का मैदान :
गौरीशंकर सिंह रिटायर्ड होने के बाद भी हर किसी के लिए मास्टर साहब ही हैं। सेवानिवृत्ति के बाद भी खेल में वह युवाओं का भविष्य गढ़ रहे हैं। अपनी पीएफ की राशि से उन्होंने पौने छह बीघा जमीन में खेल मैदान तैयार कराया। इसमें करीब डेढ़ सौ बच्चे हॉकी के गुर सीख रहे हैं। बेटे ओलंपियन विवेक सिंह(33) की कैंसर से मौत के बाद उनकी स्मृतियों को जिंदा रखने के लिए गौरी शंकर सिंह ने जमीन खरीदी और उस पर विवेक सिंह हॉकी अकादमी खोलकर बच्चों को मुफ्त प्रशिक्षण देने की शुरुआत की। उन्होंने बताया कि नौकरी के दौरान उन्होंने 1971 से यूपी कॉलेज में बच्चों को हॉकी का प्रशिक्षण देना शुरू किया। इनसे प्रशिक्षित युवाओं में आज 20 अंतरराष्ट्रीय और सौ से अधिक राष्ट्रीय खिलाड़ी हैं। खेल में योगदान को लेकर 2011 में इनके ऊपर 'एंड वी प्ले ऑन' नाम से बनी फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला है।