कश्मीर घाटी में आतंकवादियों से मुठभेड़ के बीच मासूम बच्चे की जान बचाने वाले सीआरपीएफ के जवान पवन कुमार चौबे ने जिस बहादुरी का परिचय दिया वह बेहद प्रशंसनीय है। पवन ने "अमर उजाला" से बातचीत में कहा कि बच्चे को बचाने की खुशी के साथ ही साथी की शहादत का बहुत गहरा दुख है।
सोपोर आतंकी हमले के जांबाज पवन ने कहा- बच्चे को बचाने की खुशी पर साथी की शहादत का गम
अपनों से बिछड़ना बेदह दुखदायी
पवन ने कहा कि हम देश की सरहद पर तैनात हैं और यह हमारा रोजाना का काम है। लेकिन आप जिनके साथ रहते हैं, उनका हमेशा के लिए बिछुड़ना दुखदायी तो होता ही है। मां-बाप के आशीर्वाद और सीआरपीएफ में मिले प्रशिक्षण से हमने यही सीखा है कि देश के दुश्मनों को सबक सिखाने से कभी पीछे नहीं हटना है।
पति की बहादुर पर गर्व
पवन के पिता सुभाष चंद्र और पत्नी शुभांगी ने बताया कि रोजाना सुबह एक बार वह फोन जरूर करते हैं। बुधवार की सुबह मोबाइल पर घंटी जाने के बाद भी कॉल नहीं रिसीव हुई तो मन घबराने लगा। दोपहर में बात हुई तो पवन ने कहा कि थोड़ी मुश्किल में हैं, अभी कुछ देर बाद बात करते हैं। इससे घबराहट और भी बढ़ गई। तब तक टीवी में समाचार में कश्मीर घाटी की घटना दिखाई जाने लगी तो जानकारी हुई।
इसके बाद पवन ने बात की तो सुकून मिला। शुभांगी ने बताया कि एक बेटी दिव्यांशी (5) और बेटा दिव्यांश (8) है। दिसंबर में पवन घर आए थे, उसके बाद से नहीं आए। जब पता लगा कि उन्होंने एक मासूम बच्चे की जान बचाई है तो पति पर गर्व हुआ। रोजाना ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वह सुरक्षित रहें और देश के दुश्मनों को ठिकाने लगाने में कोई कोर कसर न छोड़ें। दोनों बच्चे भी अपने पापा की बहादुरी का किस्सा सुनकर बेहद खुश हैं और उन्होंने फोन पर जय हिंद कहा।
सीआरपीएफ के कमांडेंट ने घर तक पहुंचने के खराब रास्ते को बनवाने का दिया आश्वासन
दरअसल, पवन की बहादुरी की जानकारी होेने पर उनके वाराणसी के गोलधमकवां (गरथौली) स्थित घर में गुरुवार को बधाई देने वालों का तांता लगा रहा। वीर जवान पवन की बहादुरी से गदगद 95 बटालियन सीआरपीएफ के कमांडेंट नरेंद्र पाल सिंह और द्वितीय कमान अधिकारी सुरेश मिश्र जवानों के साथ गुरुवार की सुबह उनके घर पहुंचे।
सीआरपीएफ के कमांडेंट ने कहा कि वीर जवान पवन के चलते सीआरपीएफ ही नहीं पूरे देश का मान बढ़ा है। उनके परिजन भी सम्मान के पात्र हैं, जिन्होंने ऐसा सपूत देश सेवा के लिए भेजा है। कमांडेंट ने पवन के माता-पिता, पत्नी व बच्चों को अंगवस्त्रम, माला, फल और मिठाई देकर हौसला बढ़ाया। पवन के पिता ने घर तक आने वाले खराब रास्ते को बनवाने की मांग की।
इस पर कमांडेंट ने कहा कि जिलाधिकारी से मिलकर सड़क की समस्या का समाधान कराएंगे। इसके साथ ही इस सड़क का नाम पवन कुमार चौबे के नाम पर कराने का प्रयास करेंगे। कमांडेंट ने पवन के परिजनों से कहा कि कभी भी कोई समस्या हो तो बेहिचक उनसे संपर्क करें। इसके साथ ही आश्वस्त किया कि कोराना वायरस के संक्रमण से बचाने के लिए पूरे गांव को सैनिटाइज करा कर पौधरोपण भी कराएंगे।
पवन के परिजनों ने भारत-पाक युद्ध में दिखाई थी दिलेरी
वीर जवान पवन के पूर्वजों ने भी देश की सीमा पर जांबाजी का परिचय दिया था। पवन के पूर्वज भारत-पाकिस्तान युद्ध में शामिल हुए थे। इस छोटे से गांव में आधा दर्जन फौजी हैं। 1962 में चीन की लड़ाई में परिवार के स्व. कमला चौबे सूबेदार शामिल हुए थे। फिर 1971 की लड़ाई में भी वह शामिल हुए।
परिवार के ही स्व. शारदा चौबे 1965 और 1971 की लड़ाई में पाकिस्तान के दांत खट्टे कर दिए थे। नागेंद्र प्रसाद चौबे रिटायर्ड फौजी हैं, इन्होंने कुपवाड़ा और श्रीनगर आदि जगह तैनात रहकर देश सेवा की। रामसुरेश चौबे भी भारत-पाकिस्तान की लड़ाई में शामिल रहे हैं। रिटायर्ड हवलदार दुर्गेश चौबे भी सेना से अवकाश प्राप्त सैनिक हैं।