कोरोना महामारी से बचाव के लिए जब लॉकडाउन 1.0 ने जिंदगी की गाड़ी पर ब्रेक लगाया, तो उम्मीद थी कि माना कि घना अंधेरा हो गया है, पर जल्दी ही सुबह होगी। पर लॉकडाउन 1 के बाद 2 फिर 3 भी बीतने को है और चौथे चरण का भी एलान हो गया है। इस घोषणा के साथ ही प्रवासियों को जिंदगी की गाड़ी चलने की उम्मीद थी, वो आस अब आंखों से ओझल सी हो गई है। अब तो बस एक ही सपना है जिसे हकीकत बनाने के लिए महराष्ट्र, गुजरात दिल्ली सहित देश के अन्य राज्यों में बसे पूर्वांचल के जिलों के लोग चल दिए अपने पुरखों के वतन की ओर।
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पैदल चलने की जब नही रही ताकत तो एक-दूसरे का बने सहारा
- फोटो : अमर उजाला
दरअसल, पूर्वांचल के वाराणसी, जौनपुर सहित अन्य जिलों की आधी आबादी देश के अन्य राज्यों में रोजगार करके अपना और अपनों का भरण-पोषण करती है। लॉकडाउन ने जब रोजगार छीना, तो पेट भरने पर संकट आ गया।
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जिंदगी जीने की चाहत में नहीं रही सुख सुविधाओं की आस
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इस संकटकाल में सबको बस एक ही उम्मीद दिखी और वो थी अपने वतन पर गुजर बसर करने का। जब उम्मीद दिखी, तो हजारों किलोमीटर का नामुमकिन सा सफर मुमकिन हो गया और जो जिस हाल में था, वो परिवार को लेकर चल पड़ा।
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जिंदगी बचाने की जुगत में अपनी मंजिल की ओर बढ़ते कदम
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सरकारों ने जब तक इस मुश्किल को महसूस किया और कुछ करने की सोची तब तक तो एक बड़ी आबादी पैदल सफर शुरू कर चुकी थी और आज भी तय कर रही है। अब प्रवासियों को लेकर स्पेशल ट्रेनें भी आ रही हैं, पर उतने ही लोग सड़कों पर लगातार चलते थके कदमों से, आंखों में बेबसी के आंसू लिए चले जा रहे हैं अपने वतन की ओर।
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सताने लगी धूप तो गमछा बना सहारा
- फोटो : अमर उजाला
केंद्र सरकार की ओर से यह भी कहा गया है कि जिस राज्य से मजदूर जा रहे हैं, और जहां जा रहे हैं, उन दो राज्यों द्वारा इनकी पहले जांच करने और उनमें लक्षण न पाए जाने के बाद ही सड़क मार्ग से आवाजाही के लिए सहमत होना चाहिए और राज्यों को सैनिटाइज्ड बसों की व्यवस्था भी करनी होगी।