वाराणसी नाव हादसा: छह साल पहले भी लापरवाही पड़ी थी भारी, नाव पलटने से डूब गए थे 18 लोग
वाराणसी में रविवार शाम गंगा में भदैनी घाट के सामने नाव पलट जाने से 11 लोग डूब गए। आनन फानन में एनडीआरएफ समेत अन्य रेस्क्यू टीमों ने नौ लोगों को बचा लिया। नाव में पांच छात्रों का ग्रुप था जिनमें दो छात्र लापता हैं। तलाश में देर रात तक टीमें लगी रहीं। गंगा की तलहटी में सैकड़ों मीटर तलाश करने के बाद भी रेस्क्यू टीम के हाथ निराशा ही लगी।
यह कोई पहला मामला नहीं है। निर्धारित क्षमता से अधिक लोगों को नाव में बैठाना और नाविकों की लापरवाही पहले भी लोगों की जिंदगी पर भारी पड़ी है। अगस्त 2014 में रोहनिया क्षेत्र के बेटावर में 40 श्रद्धालुओं से भरी नाव गंगा में डूब गई थी। पुलिस, पीएसी और एनडीआरएफ के जवानों ने कड़ी मशक्कत के बाद 22 लोगों को बचा लिया था, जबकि 18 लोगों का पता नहीं लगा था।
गंगा में शहर और देहात में चलने वाली 90 फीसदी से ज्यादा नावों में लाइफ जैकेट सहित सुरक्षा के अन्य उपकरण नहीं रहते हैं। पांच अगस्त 2014 को मिर्जापुर के 40 श्रद्धालु रोहनिया क्षेत्र के शूलटंकेश्वर में दर्शन-पूजन करने आए थे। वापसी के दौरान मोटरबोट का साइलेंसर टूट कर नदी में गिर गया था। इस वजह से नाव में पानी भर गया और वह गंगा में डूब गई थी। इसी तरह 29 फरवरी 2020 को चंदौली के धीना थाना अंतर्गत महुंजी में ओवरलोड नाव गंगा में डूब गई थी। नाव में सवार 30 लोगों में से पांच लोग लापता हो गए थे। 24 घंटे बाद पांचों के शव बरामद हुए थे।
नावों की चेकिंग नहीं की जाती कभी
पुलिस, जिला प्रशासन और नगर निगम की ओर से कभी औचक निरीक्षण कर यह नहीं देखा जाता है कि नाविक निर्धारित क्षमता से ज्यादा सवारी तो नहीं बैठा रहे हैं। जबकि घाटों के समीप ही जल पुलिस चौकी, अस्सी चौकी और दशाश्वमेध चौकी है। पुलिस, प्रशासन और नगर निगम के आला अफसर भी अक्सर गंगा घाटों पर जाते हैं, इसके बावजूद नाविकों से सवारियों को लेकर पूछताछ न होने से उनकी मनमानी जारी रहती है।