मुरादाबाद के मझोला के मीरपुर निवासी सुंदरलाल प्लंबर थे। उनके परिवार में दो बेटे राजेश, बंटी और एक बेटी शशि है। परिवार के लोगों को आज पछतावा हो रहा है कि शनिवार को पिता को आदर्श कॉलोनी जाने से रोक लिए होता तो शायद आज वह जिंदा होते। बेटे राजेश के मुताबिक शनिवार की शाम पिता टंकी लगाने के बाद घर लौटे थे। कुछ देर घर में रुके। इसके बाद वह जल्दी लौटने की बात कहकर घर से निकल गए थे।
शराब पीने से पांच की माैत मामला: पछता रहा सुंदरलाल का परिवार, बेटा बोला- काश पिता को जाने से रोक लिया होता
इसके बाद परिवार के लोग उनका इंतजार कर रहे थे। रात में घर आए तो शराब के नशे में थे। सोमवार की रात अचानक वह उल्टियां करने लगे। उन्हें लेकर निजी अस्पताल गए, जहां भर्ती करा दिया। मंगलवार को उनकी मौत हो गई। पिता की मौत के बाद से बेटे और बेटी रो रही हैं।
पत्नी को चाऊमीन के ठेले पर छोड़ शराब पीने चला गया था चंद्रपाल
शराब पीने के बाद जान गंवाने वाले चंद्रपाल का परिवार प्रीत विहार में रहता है। उसके परिवार में पत्नी के अलावा दो बेटे राजीव, अनिकेत और तीन बेटियां पूजा, निशी और पिंकी हैं। चंद्रपाल के छोटे भाई सत्यभान की मीरपुर कब्रिस्तान के सामने सब्जी की दुकान है। इसी दुकान के पास चंद्रपाल अपनी पत्नी के साथ चाऊमीन का ठेला लगाता है।
शनिवार की शाम चंद्रपाल अपनी पत्नी को चाऊमीन के ठेले पर छोड़कर आदर्श कॉलोनी में शराब पीने गया था। चंद्रपाल के साथ महेश, विक्की, सुंदर लाल और दीपू उर्फ संदीप भी गए थे। चंद्रपाल की मौत के बाद से पत्नी, बेटी और बेटों का रो रोकर बुराहाल है।
शादी के कुछ दिन बाद ही विक्की को छोड़कर चली गई थी पत्नी
मीरपुर निवासी विक्की के परिवार में दो भाई रवि और छोटू के अलावा पिता किशन लाल और मां कस्तूरी हैं। परिवार के लोगों ने बताया कि विक्की संविदा पर सफाई कर्मी था। विक्की की शादी हुई थ। लेकिन कुछ दिन बाद ही पत्नी उसे छोड़कर चली गई थी। इसके बाद से विक्की रोज शराब पीता था। वह अक्सर आदर्श कॉलोनी में जाता था। विक्की की मौत से मां कस्तूरी और भाई सुबक रहे हैं।
पति की मौत के बाद संतोष देवी ने परिवार को संभाला, बेटे की मौत से टूटीं
मझोला के कांशीराम नगर कॉलोनी से सटे भोगपुर मिठौनी निवासी संतोष देवी बेटे संदीप उर्फ दीपू की मौत से टूट गई हैं। बेटे को याद कर संतोष फूट फूट कर रोने लगीं। बोलीं, जब पति की मौत हुई थी तब संदीप, कुलदीप और दोनों बेटियां संगीता और बबीता बहुत छोटी थीं। मैंने मेहनत मजदूरी की और बेटे-बेटियों को पाला। अब बेटा मेहनत मजदूरी कर का खर्च चलाने में मदद करने लगा था। वह बेटे की तस्वीर हाथ में लगाकर उसे बार-बार याद करती रहीं।