Pics: मेरठ के इन गांव में खूब फुदकती है बया, लालटेन जैसे खास घोंसले बनाने में हाेती है माहिर
देश में बया की संख्या धीरे-धीरे कम होती जा रही है। इस चिड़िया के बारे में कहा जाता है कि इंजीनियर्स को इसी का घोंसला देखकर नई-नई तरह की बिल्डिंग बनाने का आइडिया मिला था। कमाल के कारीगर होते हैं ये पक्षी। इसमें नर बया ही घोंसला बनाते हैं। ईख के खेत से पत्ती, अलग-अलग तरह की मिट्टी और दूर-दराज से सरकंडे की घास को चुनकर ये तिनका-तिनका ऐसे पिरोते हैं, जैसे कोई ख्वाब बुन दिया हो। मेरठ में अब कम ही ऐसी जगह हैं, जहां पर दर्जनों बया के घोंसले एक साथ दिखाई दे जाएं। कुछ गांव अभी बचे हैं, जहां पर बया की तादात अच्छी खासी है।
यहां है बया का बड़ा ठिकाना
मोहिउद्दीनपुर से छह किलोमीटर दूर गेझा गांव में बया का बड़ा ठिकाना है। गांव के कपिल बताते हैं कि हमारे गांव का यह पीपल देसी बया का पुराना ठिकाना है। हर साल यहां बया नए घोंसले बनाते हैं। इस मौसम में बया घोंसले बनाने में जुटे थे। आठवीं और नौवीं में पढ़ने वाले हिमांशु और शिवम कहते हैं कि कक्षा में जब बया का जिक्र आता है तो हम सबको बताते हैं कि हमारे यहां पीपल के पेड़ पर खूब बया रहती हैं। गेझा की तरह रिठानी का जंगल और कंकरखेड़ा में शोभापुर का मिलिट्री एरिया भी बया का बड़ा ठिकाना है। इंचौली में सैनी गांव के आसपास, बक्सर गांव के जंगल में बया के घोंसले आपको दिख जाएंगे। हस्तिनापुर के मखदूमपुर और बिजनौर के रास्ते पर बया के घोंसले आपको बड़ी संख्या में दिखेंगे। लेकिन बाकी जगहों की हालत खराब है।
भारत में मिलती है चार तरह की बया
21 साल से फिन वीवर (पहाड़ी बया) पर तराई के जंगलों में रिसर्च कर रहे सीनियर ऑर्नीथोलॉजिस्ट डॉ. रजत भार्गव बताते हैं कि भारत में चार प्रकार की बया पाई जाती हैं। इनमें एक है बया वीवर। ये खजूर, बबूल, पीपल आदि के पेड़ों पर अपने घोंसले बनाता है। दूसरी बया है ब्लैक ब्रेस्टिड वीवर। इसको मोमिया चोंच बया भी कहते हैं। ये सरकंडों वाली जगह पर रहती है।
तराई में रहना पसंद करती ये बया
सरकंडों और ड्राई ग्रासलैंड कम होने की वजह से मेरठ में इसकी संख्या घट रही है। हस्तिनापुर सेंचुरी में ये आसानी से देखने को मिल जाती हैं। तीसरी बया है स्ट्रीट वीवर बर्ड। इसे जालीदार बया भी कहते हैं। ये पटेरा यानी चटाई घास वाली जगहों के पास अपना घोंसला बनाती हैं। ये अब कम ही जगह पर दिख रही हैं। चौथे नंबर पर आती है फिन वीवर। इसे पहाड़ी बया भी कहते हैं। ये तराई में रहना पसंद करती है।