विरासत की सियासत बचाने बागपत के चुनावी रण में उतरे रालोद उपाध्यक्ष जयंत चौधरी चित्त हो गए। जाट वोटों का ध्रुवीकरण, दलित वोटों का कम प्रतिशत हार की वजह रहा।
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जयंत चौधरी और सत्यपाल सिंह का फाइल फोटो
- फोटो : अमर उजाला
रालोद का गढ़ कही जाने वाली छपरौली और सिवाल खास विधानसभा में भी जयंत चौधरी निर्णायक बढ़त नहीं ले सके। यही वजह रही कि कांटे के मुकाबले में वह आखिर तक मैदान में जरूर रहे, लेकिन भाजपा के चक्रव्यूह को भेद नहीं सके।
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सत्यपाल सिंह और जयंत चौधरी का फाइल फोटो
- फोटो : social media
रालोद ने बागपत का किला जीतने के लिए हर दांव चला था। सपा और बसपा से गठबंधन किया गया। यही नहीं कांग्रेस बागपत सीट पर मैदान में नहीं थी। इस बार युवाओं को लुभाने के लिए रालोद अध्यक्ष चौधरी अजित सिंह ने बागपत से अपने बेटे जयंत चौधरी को मैदान में उतारा था। जाट, मुस्लिम और दलित समीकरण का गणित फलाया गया, लेकिन नतीजे उल्टे निकले।
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जयंत चौधरी
- फोटो : अमर उजाला
इसकी बड़ी वजह जाट वोटों को सियासी पंडितों की उम्मीद से ज्यादा भाजपा के पक्ष में ध्रुवीकरण रहा। छपरौली विधानसभा में रालोद 70 हजार वोटों से बढ़त की उम्मीद लगाए बैठा था, लेकिन यह सिर्फ उम्मीद ही रह गई।
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जीत के बाद सत्यपाल सिंह के साथ सेल्फी लेते
- फोटो : अमर उजाला
वहीं सिवाल खास सीट पर भी रालोद को सिर्फ 34763 वोटों की बढ़त मिली। जिस कारण बागपत लोकसभा में कमल खिलने से कोई रोक नहीं सका। मुकाबला कांटे का हुआ।