वह कौन सी मजबूरियां रही होंगी जो एक मां ही बच्चों की कातिल बन गईं। अपने बच्चों का गला घोंटने में पिता के हाथ नहीं कांपे। माता-पिता ने ही इतना कठोर कदम उठा लिया।
सुसाइड नोट लिखा, प्लान बनाया और पांच घंटे बाद उठाया खौफनाक कदम, ये हैं आत्महत्याओं के बड़े कारण
- एकल परिवारों में आपसी दुख-दर्द नहीं बांट पाते हैं लोग
- असुरक्षा के चलते गहरे अवसाद में गलत कदम उठाते हैं लोग
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क्रोमेटोफोबिया तो नहीं था
मेरठ में हुई दोनों ही घटनाओं में परिवार को मौत के घाट उतारने वाला इंसान घर का मुख्य सदस्य था। ऐसे में कह सकते हैं कि परिवार का वह सदस्य क्रोमेटोफोबिया से पीड़ित हो सकता है। क्रोमेटोफोबिया यानी पैसे को लेकर डर।
पश्चिमी देशों में तो कर्ज के डर से हर पांच में से एक इंसान पीड़ित है, मगर भारत में ऐसा कोई आंकड़ा फिलहाल नहीं हैं। जिस इंसान पर कर्ज हो वो क्रोमेटोफोबिया से पीड़ित होता है और ऐसा कदम उठाता है।
सामाजिक व्यवस्था में हो सुधार
पूरे परिवार का एक साथ आत्महत्या होना यह सामाजिक ताने-बाने में आती गिरावट का भी संकेत है। दोस्तों, अपनों संबंधियों को अपनी परेशानी इसलिए न बताना कि अपनों से इन परेशानियों का हल नहीं मिलेगा, बल्कि जमाना हमारा मजाक बनाएगा। जिससे लोग तनाव में चले जाते हैं। इसे कंट्रैक्चुअल सुसाइड यानी नकारात्मक सोच के कारण आत्महत्या कह सकते हैं।
मनुष्य पर हावी हो जाता है तनाव
जिला अस्पताल के मनोचिकित्सक डॉ. कमलेंद्र किशोर ने बताया कि जब लोगों को लगता है कि अब मुश्किल से बच नहीं पाएंगे तो तनाव इतना गहरा हो जाता है कि इंसान उबर नहीं पाता। ऐसे में अगर व्यक्ति अपनी बात किसी से साझा करे तो उसका हल उसे मिल सकता है।
परिजनों को लगता है हमारा जीना संभव नहीं तो वे बच्चों के लिए भी ये कदम उठा लेते हैं। कोरोना के दौरान अवसाद एवं आत्महत्या के मामले बढ़े हैं। यह तनाव की सीनियर स्टेज है, कई दिन तक इंसान प्लान करता है, फिर यह कदम उठाता है।
बस अब कुछ नहीं बचा
मनोविज्ञानी डॉ. कशिका जैन के अनुसार ऐसे कदम उठाने का बड़ा कारण निराशा और डर है। जब इंसान को लगता है कि बस अब कुछ नहीं बचा, चारों तरफ बस अंधेरा और डर है। ऐसी स्थिति में अवसाद बढ़ता जाता है, इंसान मरने से पहले ही मर जाता है। निराशा के चलते पूरे परिवार को खत्म कर देता है। आर्थिक तंगी, निजी परेशानी, कर्ज, आपसी झगड़े इस अवसाद के कारण होते हैं।