सहारनपुर बेहट रोड स्थित गांव मढ़ कच्ची शराब बनाने का गढ़ है। गांव में पिछले 50 साल से अधिक समय से शराब बनाने का अवैध धंधा चल रहा है, लेकिन आबकारी विभाग और पुलिस प्रशासन इस पर पाबंदी नहीं लगा पाया। वर्तमान में भी 20 से 25 परिवार इस धंधे में लिप्त हैं। शराब बनाने में महिलाएं भी शामिल हैं।
तीन दिन से जनपद में जहरीली शराब पीने से हुई मौतों के बाद भी गांव में शराब की बिक्री पर रोक नहीं लग सकी है। सूरज ढलते ही गांव में कच्ची शराब की बिक्री शुरू हो जाती है। गांव मढ़ की दूरी कोतवाली से करीब चार किलोमीटर है। यहां एक बिरादरी शराब निकालने का काम करती आ रही है। पहले इस कार्य को पुरुष करते थे, पुश्तैनी रूप से कार्य होता रहा तो महिलाएं भी इसमें जुड़ती चलीं गईं।
कच्ची शराब पीने वाले ही नहीं, बनाने वाले भी इसका सेवन करते रहे और असमय मौत के मुंह में जाते रहे। ऐसे भी परिवार हैं, जिनमें पुरुषों की मौत के बाद उनकी विधवाओं ने इस धंधे को थाम लिया है। वर्तमान में करीब 25 परिवार शराब बनाने का काम कर रहे हैं। इसके लिए गन्ने के खेतों में भट्ठियां लगाई हुई हैं।
गांव की कई दुकानों पर गिलास में 10 से 20 रुपये के पैग बिकते हैं। पॉलीथिन में भी सील कर शराब बेची जाती है। करीब दो वर्ष पहले गांव की महिलाओं ने शराब के खिलाफ आंदोलन किया था। उन्होंने खेतों में बनी शराब की भट्ठियों को उखाड़कर आबकारी विभाग और पुलिस को सौंपा था। मंगल दिवस और कोतवाली में शिकायतों के अलावा वह डीएम से भी शराब का धंधा बंद कराने की मांग कर चुकी हैं। मगर अवैध धंधा जारी है।
शराब ने उजाड़ा महिलाओं की मांग का सिंदूर
गांव मढ़ में वर्तमान में 40 से अधिक महिलाएं विधवा हैं, जिनमें ज्यादातर अनुसूचित जाति की ही महिलाएं शामिल हैं। इनमें ज्यादातर महिलाओं के पतियों की मौत का कारण शराब ही बनी। इस समय भी शराब के कारण काफी लोग बीमार हैं।