इलाहाबाद उच्च न्यायालय में दाखिल जनहित याचिका में सरकार की तरफ से रेड लाइट एरिया प्रकरण में जिला पुलिस-प्रशासन ने अपना जवाब दाखिल किया। जवाब में सरकार की ओर से दावा किया गया है कि मेरठ में अब कोई रेड लाइट एरिया नहीं है। वहीं, सरकार के इस जवाब से याचिकाकर्ता ने नाइत्तफाकी जताई है। आगे जानें क्या है यहां की असली हकीकत: -
पुलिस-प्रशासन का दावा, मेरठ में अब नहीं रेड लाइट एरिया लेकिन हकीकत कुछ और है जनाब
ये है मामला
समाजसेवी और हाईकोर्ट के अधिवक्ता सुनील चौधरी द्वारा मेरठ के रेडलाइट एरिया को लेकर एक जनहित याचिका दायर की गई थी। इस याचिका पर हाईकोर्ट द्वारा सरकार से जवाब मांगा गया तो डीएम, एसएसपी, जिला प्रोबेशन और उद्धार अधिकारी के माध्यम से जो जवाब भेजा गया है, वह बहुत ही चौंकाने वाला है। इस जवाब में कहा गया है कि जब भी हमें कोई सूचना मिलती है तो हम रेड लाइट एरिया में छापा डालकर महिलाओं को मुक्त कराते हैं।
जनवरी 2018 में 41 महिलाओं को इम्मोरल ट्रैफिक प्रीवेंशन एक्ट 1956 के तहत मेरठ रेड लाइट एरिया से मुक्त कराया है। साथ ही साल 2010 में 21 सेक्स वर्करों को मेरठ कबाड़ी बाजार रेड लाइट एरिया से मुक्त कराकर उनको सिलाई कढ़ाई की ट्रेनिंग दिलाई गई थी और उनका इस तरह पुनर्वास कर समाज की मुख्यधारा से जोड़ा गया है। अब मेरठ में रेडलाइट एरिया नहीं है।
अगली सुनवाई 25 जनवरी को
सामाजिक कार्यकर्ता सुनील चौधरी की जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायमूर्ति गोविंद माथुर व न्यायमूर्ति चंद्रधारी सिंह की खंडपीठ ने अगली सुनवाई की तिथि 25 जनवरी नियत की है। अधिवक्ता व समाजसेवी सुनील चौधरी ने मांग की है कि कोठे बंद कराए जाएं। महिलाओं का पुनर्वास कराया जाए और उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ा जाए। याची ने उसे दलालों द्वारा याचिका वापस लेने की धमकी देने के आरोप में प्राथमिकी भी दर्ज कराई है और कोर्ट से सुरक्षा की मांग भी की है।
जिला क्षय रोग अधिकारी की रिपोर्ट से खुली कलई
सरकार द्वारा हलफनामा दाखिल करते समय जिला क्षय रोग अधिकारी की रिपोर्ट को नजरअंदाज कर दिया गया जिसमें जिला क्षय रोग अधिकारी ने यह बताया था कि मेरठ जिले में साल 2009 से लगातार रेड लाइट एरिया चल रहा है। जहां लगभग 75 कोठे हैं और 400 सेक्स वर्करों को अप्रैल, मई जून 2018 में 20 हजार से ज्यादा कंडोम का वितरण किया गया है।