मेरठ शहर से करीब 20 किलोमीटर दूर जॉनी क्षेत्र के सिसौला बुजुर्ग गांव में लोगों ने फुटबॉल बनाने के लिए सुई क्या उठाई, उनकी जिंदगी बदलती चली गई। एक घर से शुरू हुआ काम, अब पूरे गांव में फैल गया और रोजगार का बड़ा जरिया बन गया है। 12 हजार की आबादी वाले गांव में करीब 2500 लोग इस व्यवसाय से जुड़े हैं। हर महीने यहां पर डेढ़ से दो लाख फुटबॉल बनाई जाती हैं, जबकि साल भर में 20 लाख से ज्यादा फुटबाल तैयार हो जाती हैं। ये करीब 15 करोड़ रुपये में बिकती हैं।
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मुकेश कुमार एक से डेढ़ लाख रुपये प्रति माह कमा रहे हैं। गांव निवासी सरवरी तीन बेटियों के साथ फुटबॉल की सिलाई में लगी हैं। सरवरी ने बताया कि उनके शौहर दाऊद मजदूरी करते हैं। इससे परिवार चलाने में परेशानी होती है। सभी महिलाएं फुटबॉल की सिलाई कर रही हैं। 6 से 25 रुपये तक फुटबॉल की सिलाई मिल जाती है। घर के काम के साथ यह काम किया जा रहा है। इससे आर्थिक तौर पर मजबूती मिल रही है।
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बच्चे भी करते हैं मदद
बृजपाल (45) ने बताया कि दादा के समय से यही काम कर रहे हैं। 30-35 हजार रुपये महीना कमा लेते हैं। पांच बच्चे पढ़ाई करते, खाली समय में बच्चे भी फुटबॉल बनाते हैं। जालंधर और मेरठ से कच्चा माल आता है।
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मेरठ-जालंधर से आता है माल
बिजेंद्र ने बताया 28 साल से फुटबॉल बनाने का काम कर रहे हैं। बेटे मुकुल भी यही काम कर रहे हैं। मेरठ और जालंधर से माल आता है। 30-40 हजार रुपये महीना कमा लेते हैं। कारीगरी के साथ गांवों में फुटबॉल तैयार कराते हैं।
चार दशक पहले शुरू किया काम
रोहन स्पोर्ट्स के मालिक हरि प्रकाश (63) ने बताया कि 16 साल की उम्र में मेरठ से काम सीखकर आए। यहां आकर 40 साल से ज्यादा समय से फुटबॉल बनाने का काम कर रहे हैं। तब से ही गांव में फुटबॉल बनाने का काम तेजी से बढ़ा, जो आज पूरे गांव वालों के रोजगार का साधन बन चुका है। कोरोना काल में भी काम नहीं रुका, माल स्टॉक किया। रोजगार पूरे गांव को मिलता रहा।