बेसिक शिक्षा विभाग के स्कूलों की व्यवस्था पटरी से उतर गई है। सरकार शिक्षा पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, लेकिन बच्चों के पास पढ़ने के लिए न तो किताबें हैं और न ही उन्हें खाना समय से मिल रहा है। इसी वजह से स्कूलों में बच्चों की संख्या घटती जा रही है। तमाम शिकायतों के बाद भी अधिकारी मिड-डे मील बांटने वाले एनजीओ पर कार्रवाई नहीं कर रहे हैं।
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अमर उजाला की टीम ने शनिवार को बेसिक शिक्षा विभाग के कई स्कूलों में मिड-डे मील की स्थिति का जायजा लिया। कई स्कूलों में बच्चों को कई महीने से दोपहर का भोजन नहीं मिला। जहां पर दूध और खाना बांटा जा रहा था, उसकी गुणवत्ता ठीक नहीं मिली। गिनती के स्कूलों में मेन्यू के हिसाब से खाना मिला। जिले में 910 प्राथमिक विद्यालय और 434 उच्च प्राथमिक विद्यालय हैं और अधिकांश में व्यवस्था खराब है।
ग्राम प्रधान और प्रधानाचार्य में चल रही रार
जिठोली प्राथमिक विद्यालय में बच्चों को कई माह से मिड-डे मील नहीं मिला है। प्रधानाचार्य और ग्राम प्रधान के बीच चल रही खींचतान के कारण भोजन नहीं मिल पा रहा। प्रधानाचार्या अर्चना राठी ने बताया कि प्रधान मिड-डे मील के लिए फर्जी तरीके से बच्चों की संख्या बढ़ाने का दबाव दे रहे हैं। इस कारण कनवर्जन कॉस्ट नहीं मिली है।
प्रधान जीत सिंह का कहना है कि प्रधानाचार्या द्वारा लगाए जा रहे आरोप निराधार हैं। प्रधानाचार्य के खिलाफ गांव के लोगों ने आला अधिकारियों से बच्चों का मानसिक उत्पीड़न करने की शिकायत की हुई है। प्रधानाचार्य का हस्तिनापुर के लिए स्थानांतरण कर दिया गया था। लेकिन वे कोर्ट से स्टे ले आईं।
कभी-कभी आता है अच्छा खाना
नगर क्षेत्र स्थित खैरनगर प्राथमिक कन्या विद्यालय में 80 बालिकाएं पढ़ती हैं। शनिवार को स्कूल में मेन्यू के आधार पर चावल सब्जी दी गई। प्रधानाचार्या स्वालेहा कयूम ने बताया कि खाना तो प्रतिदिन आता है, कभी अच्छा तो कभी कामचलाऊ होता है। दूध में पानी अधिक होता है। हमने खाद्य विभाग में भी इसकी शिकायत की है।
तीन माह से नहीं मिला भोजन
रजपुरा ब्लॉक के गांव पचपेड़ा स्थित प्राथमिक विद्यालय में बच्चे तीन माह से मिड-डे मील का इंतजार कर रहे हैं लेकिन उन्हें अब तक खाना नहीं मिला। प्रधानाचार्या सुदेश बाला ने बताया कि बजट न मिलने के कारण बच्चों को भोजन नहीं मिल रहा है। बीएसए और एबीएसए को सूचना दी जा चुकी है।