जे बीमारी ने तो हमसे म्हारा काम, सुख चैन, पैसा सब छीन लिया जी। सरकार कह रही घर में रहो, लेकिन हम कैसे भीतर रहें। हम किसके धोरै जाएं, मजदूरी करके गुजारा करै हैं, लेकिन बंदी के मारे मजदूरी भी छूट गई। 400 की दिहाड़ी पर मजदूरी करके आठ सदस्यों वाले परिवार का पेट पाल रहे हरपाल आंखों में आंसू लिए यही कहते हैं।
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अपने घर पैदल जाते लोग
- फोटो : अमर उजाला
बिजनौर निवासी हरपाल नोएडा में पिछले 10 सालों से राजमिस्त्री का काम कर रहे हैं। लॉकडाउन के कारण काम बंद हो गया है। हरपाल को अपने पूरे परिवार के साथ गांव वापस लौटना पड़ रहा है। बिजनौर जाने के लिए निकले हरपाल का परिवार शुक्रवार को मेरठ में भैसाली रोडवेज बस अड्डे पर बस के इंतजार में दो घंटे से बैठा था।
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अपने घर के लिए पैदल जाते युवक
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रुंधे गले से हरपाल कहते हैं, छोटे बच्चों को लेकर दो दिन से केवल सड़कों की धूल ही फांक रहे हैं। हमको नहीं पता था कि बंदी इतनी दुखदायी होगी। सात मार्च को ही तनख्वाह मिल गई थी। पूरी तनख्वाह घर पर भेज दी थी। क्या पता था कि अचानक से पैसे की इतनी किल्लत हो जाएगी। दो दिन हो गए किसी तरह अपने घर पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। नोएडा से निकले तो पहले वहां से कोई बस ही नहीं मिली। जैसे तैसे सब्जी ढोने की डीसीएम में बैठे। अकेला होता तो पैदल भी आ जाता, लेकिन पत्नी-बच्चों को साथ लेकर कितना पैदल चलें। उस गाड़ी ने गाजियाबाद के किनारे छोड़ दिया। वहां से जैसे तैसे यहां पहुंचे हैं। जेब में किराए के लिए ना तो पैसे हैं और ना खाने के लिए कुछ है। रास्ते में अगर कहीं कोई बांटने वाला खाने का पैकेट दे देता है तो उसे ही खाकर हम गुजारा कर रहे हैं।
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कैलाश।
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कोई वाहन नहीं मिल रहा
रोडवेज बस अड्डे पर ही बैठे शहजाद नोएडा में रफूगर हैं। शहजाद ने बताया पहले तो गांव में ही अपनी दर्जी की दुकान करता था। अब दर्जियों की तो मांग रही नहीं, लोग बड़ी- बड़ी दुकानों पर कपड़े सिलाते हैं। अब नोएडा सेक्टर 62 में एक बुटीक पर काम करता हूं। क्या पता था कि इतनी बड़ी परेशानी आ जाएगी। 10 दिनों से नोएडा में किसी तरह गुजारा चल रहा था। अब बंद होने के बाद आखिर कहां जाऊं? 20 किलोमीटर से अधिक का सफर पैदल तय कर चुका हूं।
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शहजाद।
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पैदल बढ़ रहे मंजिल की तरफ
बिजनौर के ही मदन पाल पिछले 10 सालों से नोएडा में लेबर का काम कर रहे हैं। लॉकडाउन के बाद काम छूट गया, अब किसी तरह से बच्चों के पास पहुंचना चाहते हैं। मदन पाल कहते हैं कि रास्ते में अगर किसी ने खाने का पैकेट दे दिया तो पेट भरकर गुजारा कर लेता हूं। कहीं कोई दुकान या ठेला भी नजर नहीं आ रहा कि जिससे कुछ खाने के लिए मिल जाए। भूखे पेट पैदल चलकर ही अपनी मंजिल की ओर बढ़ रहा हूं। यही उम्मीद है कि जल्द से जल्द बच्चों के पास पहुंच जाऊं।