पैरों में छाले हैं। दिल की धड़कन जवाब देने लगी है। तपती धूप में भी पेड़ की छांव देखकर रुकने का मन नहीं कर रहा है। बस एक ही चाह है कि किसी तरह से जल्द से जल्द अपनों के बीच पहुंच जाएं। बस अपने घर पहुंच जाएं। कोई लखनऊ से तो कोई लुधियाना से पैदल ही लंबे सफर पर है। लेकिन दर्द सबका एक ही है। कहीं रास्ते में कोरोना कहर बनकर तो नहीं टूट पड़ेगा, पता नहीं क्या- क्या मुश्किलें आएंगी। ये सब सवाल सड़कों पर निकले इन लोगों के जेहन से अब गायब हो चुके हैं। ये बस अब एक ही बात बोल रहे हैं कि जिएं या मरें... बस जल्दी से अब घर पहुंचना है। मां बुला रही है। भाई- बहन भी इंतजार कर रहे हैं।
मां की पुकार... पैदल चलने के लिए बेबस हैं ये लोग, बोले- अब जिएं या मरें... सिर्फ पहुंचना है घर
अमर उजाला की टीम ने पैदल चल रहे लोगों से बात की तो उन्होंने सिर्फ यही कहा कि अब तो जिएं या मरें... बस जल्दी से अब घर पहुंचना है।
बीमार पति के पास पहुंच जाऊं...
बागपत निवासी शबनम तेज कदमों से चले जा रही थीं। रुकने को कहा तो पानी मांगने लगीं। सड़क किनारे थोड़ा सुस्ताते हुए बताया कि पति सरसावा में नुमाइश में दुकान लगाने गए थे। मैं बीमार बेटी को देखने सीतापुर गई थी। इसी दौरान सब कुछ बंद हो गया। पति का फोन आया कि किडनी की बीमारी ने फिर से जकड़ लिया। पति का हाल सुनकर रहा नहीं गया तो किसी तरह से टुकड़ों- टुकड़ों में कभी बस तो कभी ट्रक आदि का सहारा लेकर मेरठ आई। यहां से सरसावा के लिए कुछ नहीं मिला तो पैदल ही चल पड़ी। शबनम बताती हैं कि कोरोना का कोई डर नहीं है। बस एक ही ध्येय है कि जल्द से जल्द बीमार पति के पास पहुंच जाऊं।
...बेटा घर आ जाओ
सोमवार दोपहर के ढाई बजे जीरो माइल चौराहे पर सन्नाटा पसरा था। बेगमपुल की तरफ से तीन युवक लड़खड़ाते कदमों से बढ़ रहे थे। पेड़ की घनी छांव देखकर इनमें से एक युवक कुछ ठिठका तो दोनों साथियों ने उसे टोक दिया। कहने लगे कि चलते रहो। अब तो बस सरधना घर पहुंचकर ही आराम करना। 24 मार्च को लखनऊ से चले इन युवकों के पैरों में छाले पड़े थे। किसी तरह से पट्टी लपेटकर यहां तक पहुंचे। बात हुई तो दर्द जुबां पर आ गया। तहसील रोड सरधना निवासी दानिश ने बताया कि पैसे खत्म होने को आए तो घर फोन किया। अम्मी ने बोल दिया कि बेटा घर आ जाओ। यहां तो कुछ न कुछ मिल जाएगा। वहां रहे तो क्या होगा। नासिर और रिजवान ने बताया कि यही सोचकर पैदल निकल पड़े कि जिएं या मरें अब तो बस घर जाना है। मेरठ आकर कलेजे को राहत मिली है।
बिहार का सफर... छलके आंसू
13 लोगों की टोली सिर पर सामान उठाए चले रही थी। पूछने पर बताया कि वे किसी तरह लुधियाना से यहां तक आए हैं। कहीं पैदल तो कहीं किसी से मिन्नतें करके वाहन में बैठकर। कहां जा रहे हो... पूछे जाने पर बबलू नाम के युवक के आंसू छलक पड़े। रुंधे गले से बताया कि मोतीहारी बिहार जाना है। अभी तो बहुत लंबा सफर है। दूसरे युवक संदीप की हालत भी बेहद खराब थी। संदीप ने बताया कि पिता के गुजर जाने के बाद बहन की शादी करने के लिए वे लुधियाना फैक्टरी में नौकरी करने गए थे। अब मां ने कहा कि बेटा बहुत बीमारी फैल रही है। बस घर आ जा। संदीप ने रुकने की बात कही तो बहन ने कसम दे दी कि पैसा तो मेरी शादी के लिए ही कमा रहे हो। तुम्हें कुछ हो गया तो मां और हम भी नहीं जी पाएंगे। संदीप की बात पूरी भी नहीं हो पाई थी कि साथ चल रहे उनके साथी ने माफी मांगी और कहा कि अब जाने दीजिए। बहुत दूर जाना है। पता नहीं कितना समय लगेगा।
इनका भी तो दर्द सुनें
जालौन निवासी अल्दतफ करनाल में फैक्टरी में काम करता था। गांव के छह लोगों के साथ पैदल ही जा रहा है। अल्दतफ ने बताया कि दिन में एक बार ही भोजन मिल रहा है। रोजाना 50-60 किमी पैदल चलकर जालौन पहुंचना लक्ष्य है।