मशहूर उर्दू शायर बशीर बद्र के निधन से साहित्य और शायरी की दुनिया में गहरा शोक है। अपनी अलहदा शैली, आसान लफ्जों और गहरी भावनाओं से करोड़ों दिलों में जगह बनाने वाले बशीर बद्र अब इस दुनिया में नहीं रहे, लेकिन उनकी गजलें और शेर हमेशा लोगों की यादों में जिंदा रहेंगे।
स्मृति शेष: गजलों का शहर सूना हुआ, मोहब्बत का आखिरी मुसाफिर चला गया, अमर रहेगी बशीर बद्र की उम्दा शायरी
मशहूर उर्दू शायर बशीर बद्र के निधन से साहित्य जगत में शोक की लहर है। मोहब्बत, जुदाई और इंसानी एहसासों को गजलों में पिरोने वाले बशीर बद्र की शायरी हमेशा जिंदा रहेगी।
आम आदमी के एहसासों को बनाया शायरी की आवाज
बशीर बद्र की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि उन्होंने कठिन और भारी-भरकम शब्दों की जगह आम बोलचाल की भाषा को अपनी गजलों में जगह दी। उनकी शायरी में रोजमर्रा की जिंदगी, रिश्तों की गर्माहट, टूटन, मोहब्बत और तन्हाई साफ महसूस होती है।
उनकी गजलें सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि महफिलों, मुशायरों और लोगों की जिंदगी का हिस्सा बन गईं। यही वजह है कि उनका हर शेर सुनने वालों के दिल में उतर जाता था।
भारत-पाकिस्तान बंटवारे और दोनों देशों के रिश्तों पर भी बशीर बद्र ने कई यादगार शेर लिखे। उनका मशहूर शेर-
'दुश्मनी जमकर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे,
जब कभी हम दोस्त बन जाएं तो शर्मिंदा न हों'
आज भी लोगों की जुबान पर है। कहा जाता है कि शिमला समझौते के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को यही शेर सुनाया था।
भोपाल में बशीर बद्र की मुलाकात डॉक्टर राहत से हुई, जो बाद में उनकी जीवनसंगिनी बनीं। कठिन दौर से गुजर रहे बशीर बद्र को उन्होंने संभाला और फिर से सामान्य जीवन की ओर लौटने का हौसला दिया।
बशीर बद्र अक्सर कहा करते थे कि खुदा ने उन्हें गजलों का एक खूबसूरत शहर दिया है और वह अपनी पूरी सल्तनत मोहब्बत के नाम करना चाहते हैं। भोपाल में रहते हुए उन्होंने अपनी शायरी को नई ऊंचाइयां दीं।
जावेद अख्तर ने जताया शोक
मशहूर गीतकार और शायर जावेद अख्तर ने भी बशीर बद्र के निधन पर दुख जताया। उन्होंने लिखा कि उर्दू आज और गरीब हो गई। बशीर बद्र जैसे नायाब शायर का जाना साहित्य जगत के लिए बड़ी क्षति है।