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रूढ़ियां टूटती हैं तो इतिहास रचती हैं बेटियां,दिव्या काकरान ने अमर उजाला से साझा की सफलता की कहानी

Mon, 16 Dec 2019 09:46 PM IST
कपिल kapil रैना पालीवाल, अमर उजाला, मेरठ
रैना पालीवाल, अमर उजाला, मेरठ Published by: कपिल kapil Updated Mon, 16 Dec 2019 09:46 PM IST
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Lado, Divya Kakran has won 17 medals in national and 14 medals in international for her country
दिव्या काकरान - फोटो : अमर उजाला

जब रूढ़ियां टूटती हैं तो बेटियां इतिहास रचती हैं। सूरज पहलवान को कुश्ती विरासत में मिली थी। हरियाणा में लड़कियों को दंगल लड़ता देख उन्होंने अपनी बेटी को रेसलर बनाने की ठान ली। पिता ने विरोध किया लेकिन सूरज की जिद के आगे किसी की नहीं चली...

Lado, Divya Kakran has won 17 medals in national and 14 medals in international for her country
पिता के साथ दिव्या काकरान - फोटो : अमर उजाला

मुजफ्फरनगर में सूरज पहलवान ने अपने पिता के विरोध के बावजूद बेटे को दंगल के अखाड़े से निकालकर बेटी को वहां खड़ा किया। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। सूरज अपने परिवार को लेकर दिल्ली आ गए। पत्नी ने जांघिया लंगोट सिले और उन्होंने बेचे। दिव्या भी दंगलों में जाकर ईनाम लाती। इस कठिन डगर में मां को अपने गहने तक बेचने पड़े। संघर्षों की आंच में तपकर दिव्या सोने सी दमकीं।

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दिव्या काकरान

उन्होंने न सिर्फ अपने परिवार बल्कि पूरे देश को गौरवांवित किया। 2018 में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स और एशियन गेम्स में दिव्या ने रेसलिंग में कांस्य पदक जीता। वर्तमान में वह ओलंपिक की तैयारी कर रही हैं।

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Lado, Divya Kakran has won 17 medals in national and 14 medals in international for her country
दिव्या काकरान - फोटो : अमर उजाला

दिव्या का मूल गांव पुरबालियान है। इस समय पिछले 15 साल से वह परिवार के साथ दिल्ली रहती है। वह रेलवे में टीटी हैं। 21 वर्षीय दिव्या ने फोन पर हुई बातचीत में बताया, पापा ने मुझे बताया कि मैं स्पेशल हूं। मेरा जन्म देश के लिए हुआ है। गांव में कोई रोजगार नहीं था। वह मुझे दिल्ली लेकर आए और मेरा प्रशिक्षण शुरू कराया। हम लोगों ने बहुत तंगहाली में दिन बिताए। मेरे पापा-भाई दंगल लड़ने जाते थे। मैं भी लड़कों के साथ दंगल लड़ती थी। जो ईनाम मिलता, उससे घर चलाने में मदद होती थी। मां जांघिया लगोट बनाती और पिता बेचते थे। आज भी यही काम करते हैं। गांव में सब कहते थे, अरे, बेटी से पहलवानी मत करा।

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दिव्या काकरान - फोटो : अमर उजाला

शॉर्ट्स पहनती थी, उसमें भी दिक्कत होती थी। लड़कियों की जिंदगी सिर्फ शादी तक सिमटी थी। दसवीं तक पढ़ाकर हाथ पीले कर दिए जाते थे। अब लोगों की सोच बदल रही है। मैंने नेशनल में 17 और इंटरनेशनल में 14 मेडल जीते हैं। देश के लिए खेलकर जो गर्व महसूस होता है, उसे शब्दों में अभिव्यक्त नहीं कर सकती। मैं 68 किग्रा में कुश्ती खेलती हूं। ओलंपिक के लिए रोज सात घंटे अभ्यास करती हूं। लड़कियों को सशक्त बनने की जरूरत है। उन्हें अपनी पहचान बनानी चाहिए।

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