सर्दियों के मौसम में यूपी में हैं और सहारनपुर जिले के अमरूद को नहीं चखा तो क्या चखा? इस अमरूद को खाएंगे तो यकीनन आप सौ रुपये किलो के सेब को फेल कर देंगे। इस अमरूद की बात ही कुछ ऐसी है।
दिल्ली से दार्जिलिंग तक हैं यूपी के इस अमरूद के जलवे, कश्मीर-हिमाचल के सेब को जमकर दे रहा टक्कर
सहारनपुर जिला यूं तो आम और लीची का उत्पादन क्षेत्र कहलाता है। यहां से आम और लीची दूसरे देशों में भी निर्यात किया जाता है लेकिन अब अमरूद भी इस दौड़ में पीछे नहीं है।
जिलें में प्रवेश करते ही सड़क के दोनों और घोड़ा बग्गी पर, ठेले और रेहड़ियों पर सजा धानी, सुनहरा पीला, बड़ा और चमकीला अमरूद अनायास ही अपनी ओर आकर्षित करने लगता है। बाजार में जहां चुनिंदा खरीदार ही सेब की खरीदारी करते नजर आते हैं वहीं ठेले, रेहड़ी पर सुबह लगाया गया अमरूद शाम तक पूरा बिक जाता है।
जानकारी के मुताबिक यहां दो हजार हेक्टयर भूमि में अमरूद की बागबानी की जाती है। इससे किसान गर्मी और सर्दी के मौसम में बारी बारी से दो फसलें लेते हैं।
वहीं सर्दियों में आने वाली फसल किसानों के लिए बहार लेकर आती है। इस सीजन में आने वाले फल स्वस्थ, स्वादिष्ट और विशाल होते हैं। जो किसानों को अच्छा मुनाफा भी देते हैं।
सेब से मीठा है यहां का अमरूद
इस सीजन में अमरूद 120 रूपये प्रति किलो जबकि कश्मीर का सेब 40 से 50 रुपये प्रति किलो तक बिक रहा है। पिछले दो वर्षों से सहारनपुर के अमरूद ने अपनी यह जगह कायम रखी है और कश्मीर का सेब आगे नहीं निकल पा रहा है।
उत्पादन से अधिक मिठास के लिये यहां का अमरूद प्रख्यात है। आम के साथ साथ अब अमरूद को भी दूसरे राज्यों में निर्यात किया जाने लगा है। सहारनपुर फल मंडी से दिल्ली, चंढीगढ और पहाड़ी राज्यों तक भी इसे भेजा जाता है। इसके अलावा मेरठ, मुजफ्फरनगर समेत आसपास के जिलों में भी खूब खाया जाता है।
इन प्रजातियों को आम बिखेर रहा अपनी चमक
सहारनपुर में अमरूद की इलाहबादी सफेदा, बर्फखाना, गुलाबिया, एल 49, श्वेता ऐसी प्रजातियां है जिनसे यहां की मंडियां इन दिनों पटी हुई हैं।
इनमें वन केजी प्रजाति के अमरूद की भी इन दिनों खूब ब्रिकी हो रही है। साथ ही मधुमेह रोगियों के लिए भी फायदेमंद बताया गया है। यही कारण है यह बाजार में अपनी धाक जमा रहा है।