मेरठ के खरखौदा में सैकड़ों वर्ष से चली आ रही परंपरा के दौरान इस वर्ष भी क्षेत्र के गांव बिजौली में ऐतिहासिक होली मनाते हुए होली का रंग खेलने के बाद ग्रामीणों ने अलग-अलग मोहल्लों से पांच तख्त निकाले। सुरक्षा को लेकर कई थानों की फोर्स मौजूद रही।
Holi in Meerut: ऐतिहासिक है बिजौली की होली, नुकीले औजारों से शरीर बेधकर गांव में तख्त निकालते हैं युवक
कैसे निकलते हैं तख्त
तख्त यात्रा से पहले होलिका की पूजा के साथ जिस युवक को भेजा जाता है उस युवक के पूरे शरीर पर होली की राख मली जाती है। उसके बाद उस युवक के शरीर के विभिन्न अंग जिसमें गाल, बाजू व पेट को नुकीले औजारों से बेधा जाता है। एक तक की यात्रा के लिए तीन युवक बेधे जाते हैं। बेधे गए तीनों युवकों को तख्त पर सवार कर गांव के युवक अपने कंधों के सहारे बैंड बाजों व युवक के हुड़दंग के साथ पूरे गांव में घुमाया जाता है। इस दौरान जगह-जगह ग्रामीण अपनी मनोकामना पूरी होने पर गुड़ का प्रसाद, साड़ी व नगदी का भी चढ़ावा चढ़ाते हैं। यात्रा गांव के मुख्य चौक से होते हुए बाबा गंगापुरी की समाधि पर समाप्त होती है। इसके बाद बेधे गए सभी युवकों के घाव पर होलिका की राख मली जाती है। जिससे मान्यता है कि आज तक किसी भी युवक के के शरीर पर कोई निशान वह घाव नहीं होते।
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हिंदू मुस्लिम एकता का प्रतीक है यह यात्रा
तख्त यात्रा मूल रूप से हिंदू समाज से जुड़ी है। इस यात्रा में बिधने वाले युवक भी हिंदू समाज के ही होते हैं। लेकिन इस यात्रा में मुस्लिम समाज का भी सहयोग कम नहीं है। युवकों को बेधने वाले धातु के सभी औजार मुस्लिम समाज द्वारा ही तैयार किए जाते हैं। जिन की तैयारी वह लोग त्योहार से एक माह पहले से ही करना शुरू कर देते हैं।
ग्रामीणों ने इस ऐतिहासिक होली को बरसाने की होली जैसा मनाने की की मांग
ग्रामीण जिला पंचायत सदस्य ऋषि त्यागी, सुरेंद्र त्यागी, ब्रह्मदत्त फौजी, ओंकार त्यागी, कानेश्वर त्यागी व धीरज त्यागी सहित सभी ग्रामीणों ने इस यात्रा के दौरान मौके पर पहुंचे पुलिस प्रशासन की टीम से इस तख्त यात्रा को भी बरसाने की होली जैसी मान्यता दिलाने की मांग की है।
वृद्ध ग्रामीणों के अनुसार इस प्रथा को ग्रामीणों ने विडंबना व अंधविश्वास बताते हुए एक वर्ष नहीं मनाया। जिससे गांव बिजौली व आसपास के क्षेत्र में अनेकों प्राकृतिक आपदाएं, अकारण पशुओं में मौत व फसलों में आगजनी सहित गांव में कई बीमारियां भी फैल गई।