Commonwealth games 2022: बॉलीवुड अभिनेता अमीर खान की दंगल फिल्म का यह डायलॉग 'म्हारी छोरियां छोरों से कम हैं के' पश्चिमी यूपी की इन तीन बेटियों पर सटीक बैठता है। तीनों ही उम्र में छोटी हैं लेकिन उपलब्धि ऐसी हासिल की कि पूरी दुनिया में हर कोई सलाम कर रहा है। जी हां हम बात रहे हैं कि अर्जुन अवार्डी पहलवान दिव्या काकरान (23), अपने पहले ही अंतरराष्ट्रीय दौरे पर दो पदक जीतने वाली रूपल चौधरी (17) और देश की झोली में सिल्वर मेडल डालने वाली प्रियंका गोस्वामी (26) की। इन तीन महिला खिलाड़ियों ने अभी तक चार मेडल जीतकर हर भारतीय का दिल जीत लिया है। आइए अब इनकी संघर्ष की कहानियां और उपलब्धियां बताते हैं।
मुजफ्फरनगर जनपद में मंसूरपुर के गांव पुरबालियान की रहने वाली दिव्या काकरान ने अपने बाबा राजेंद्र पहलवान से मिली कुश्ती की विरासत को अंतरराष्ट्रीय पहचान दी है। बाबा के बाद पिता सूरज पहलवान ने अखाडे़ में कुश्ती लड़ी। लोगों के विरोध के बावजूद सूरज ने बेटी दिव्या को अखाड़े में उतार कर कुश्ती के दांवपेंच सिखाए। दिव्या ने लड़कों से भी कुश्ती लड़ी। अपनी लगन, मेहनत और परिश्रम से वह आज इस मुकाम पर पहुंचीं।
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पहलवान दिव्या काकरान
- फोटो : अमर उजाला
बता दें कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुई प्रतियोगिताओं में दिव्या अब तक 73 पदक जीत चुकी हैं। इनमें 53 गोल्ड, सात रजत और 13 कांस्य पदक शामिल हैं। दिव्या ने चीन में सीनियर एशियन चैंपियनशिप में देश के लिए कांस्य पदक, मंगोलिया में यू-23 सीनियर एशियन चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल, ऑस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट में आयोजित 21वें राष्ट्र मंडल खेलों में कांस्य पदक, इंडोनेशिया के जकार्ता में हुए 18वें एशियन गेम्स में भी कांस्य पदक जीता था।
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पहलवान दिव्या काकरान
- फोटो : अमर उजाला
वह एशियाई जूनियर चैंपियनशिप में रजत पदक विजेता बनी थीं। वहीं कामनवेल्थ में भी गोल्ड पदक जीता था। अब बर्मिंघम में नाइजीरिया की पहलवान से मिले शुरुआती झटके के बाद दिव्या काकरान ने अखाड़े में खुद को साबित कर दिखाया। देर रात खेले गए मुकाबले में दिव्या ने शानदार खेल दिखाते हुए पदक जीत लिया।
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रूपल चौधरी।
- फोटो : amar ujala
जुनून ने जैनपुर की बेटी को बनाया चैंपियन
दौड़ने की जिद और जुनून के दम पर गांव जैनपुर की बेटी रूपल चौधरी चैंपियन बन गई। शुरुआत में परिवार नहीं चाहता था कि बेटी खेलों में जाए। जिद में रूपल ने तीन दिन खाना नहीं खाया तो मां ने पिता को मनाया। वर्ष 2017 में पहली बार पिता ओमवीर सिंह रूपल को कैलाश प्रकाश स्टेडियम में कोच दंपती विशाल और अमिता सक्सेना के पास ले गए। इसके बाद रूपल आगे बढ़ती चली गईं।
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रूपल चौधरी।
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पिता ने मोटरसाइकिल से प्रतिदिन करीब 30 किलोमीटर का सफर तय कर रूपल को गांव से मेरठ स्टेडियम तक पहुंचाया। वहां कोच दंपती ने रूपल की आंखों में पल रहे सपनों को हकीकत का रास्ता दिखाया। पांच वर्ष की मेहनत के बाद रूपल ने पहले ही अंतरराष्ट्रीय दौरे में दो मेडल जीत खुद को साबित कर दिखाया है। कोलंबिया में आयोजित अंडर-20 जूनियर विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप में 400 मीटर स्पर्धा में कांस्य पदक झटका है। वहीं 4×400 मीटर स्पर्धा में भी रजत पदक जीता है। उनके सामने 4×400 मीटर बालिका वर्ग स्पर्धा में एक और पदक पाने का मौका है।