लखीमपुर खीरी के गोला गोकर्णनाथ का पौराणिक शिव मंदिर शिवभक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। प्राचीन और अद्भुत शिवलिंग की स्थापना का प्रसंग रामायण काल से जुड़ा है। मान्यता है कि भगवान शंकर ने यहां मृग रूप में विचरण किया था। वराह पुराण में लिखा है कि भगवान शिव वैराग्य उत्पन्न होने पर यहां के वन क्षेत्र में भ्रमण करते हुए, रमणीय स्थल पाकर यहीं रम गए। ब्रह्मा, विष्णु और इंद्र को चिंता हुई और वे उन्हें ढूंढते हुए यहां पहुंचे तो यहां वन में एक अद्भुत मृग को सोते देख समझ गए कि यही शिव हैं। वे जैसे ही उनके निकट गए तो आहट पाकर मृग भागने लगा।
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Sawan 2023: यूपी की 'छोटी काशी'... जहां स्थापित है अद्भुत शिवलिंग; सावन में उमड़ता है आस्था का सैलाब
Tue, 04 Jul 2023 02:11 PM IST
मुकेश कुमार
संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी
संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी
Published by: मुकेश कुमार
Updated Tue, 04 Jul 2023 02:11 PM IST
सार
गोला गोकर्णनाथ का पौराणिक शिव मंदिर शिवभक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। यहां सावन में आस्था का जन सैलाब उमड़ता है। हरिद्वार और कछला घाट से गंगाजल लाकर कांवड़िये भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। इस पौराणिक शिव मंदिर का इतिहास रामायण काल से जुड़ा है।
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Sawan 2023: गोला गोकर्णनाथ तीर्थ
- फोटो : अमर उजाला
गोला गोकर्णनाथ मंदिर में स्थापित शिवलिंग
- फोटो : अमर उजाला
रामायण काल से जुड़ी है शिवलिंग की कथा
पौराणिक शिव मंदिर से जुड़ी एक लोक मान्यता के अनुसार त्रेतायुग में भगवान शिव रावण की तपस्या से प्रसन्न हुए। रावण भगवान शिव को अपने साथ लेकर लंका ले जाने लगा। भगवान शिव ने शर्त रखी कि उन्हें रास्ते में कहीं भी रखा, तो वह उसी स्थान पर स्थापित हो जाएंगे। शर्त के अनुसार रावण भगवान शिव को लेकर लंका के लिए चला। जब रावण गोला गोकर्णनाथ के पास पहुंचा तो उसे लघुशंका का अनुभव हुआ।ये भी पढ़ें- Sawan 2023: 200 साल पुराना है बदायूं का बिरुआबाड़ी मंदिर, खोदाई में निकला था शिवलिंग; यह है मान्यता
रावण एक चरवाहे को इस हिदायत के साथ शिवलिंग देकर लघुशंका के लिए चला गया कि वह शिवलिंग भूमि पर नहीं रखेगा। काफी देर तक वापस न आने पर चरवाहे ने भगवान शिवलिंग को भूमि पर रख दिया। वापस आने पर रावण ने शिवलिंग उठाने की कोशिश की, लेकिन नहीं उठा सका। इस पर गुस्से में अपने अंगूठे से शिवलिंग को भूमि में दबा दिया। मान्यता है कि गोला के पौराणिक शिव मंदिर के शिवलिंग में रावण के अंगूठे का निशान आज भी मौजूद है।
गोला गोकर्णनाथ
- फोटो : instagram
इसलिए गोकर्णनाथ नाम पड़ा
गोला गोकर्णनाथ शिवलिंग का आकार गाय के कान की तरह होने के कारण शिवलिंग का नाम गोकर्णनाथ पड़ा। मंदिर के पास ही भव्य गोकर्ण तीर्थ है, जिसमें विशाल शिवमूर्ति स्थापित है। वर्ष 2016 में आवास विकास योजना के तहत एक करोड़ 10 लाख रुपये की लागत से तीर्थ का जीर्णोद्धार कराया गया था।भौगोलिक स्थिति
तीनों ओर से वनों से आच्छादित छोटी काशी की परिधि में गोमती, कठिना, उल्ल, सरस्वती, सरायन आदि नदियां प्रवाहित होती रही हैं। रेलवे स्टेशन से शिव मंदिर की दूरी 390 मीटर है। मंदिर का क्षेत्रफल करीब 5000 वर्ग मीटर है। शिवमंदिर के तीन द्वार हैं। धरातल से गर्भ गृह की गहराई नौ फीट है। अष्टकोणीय गर्भगृह में शिवलिंग डेढ़ फीट गहराई में स्थापित है। गोकर्ण तीर्थ का क्षेत्रफल 5300 वर्ग मीटर है।
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गोला गोकर्णनाथ मंदिर
- फोटो : अमर उजाला
पहले जूना अखाड़ा के नागा साधु थे शिव मंदिर के सर्वराकार
लगभग 150 वर्ष पहले जूना अखाड़ा के नागा साधु शिव मंदिर का सर्वराकार हुआ करते थे। जो छत्र लगे हाथियों पर सवार होकर यहां आते थे। बाद में जूना अखाड़ा के नागा पंथ ने ही गोस्वामी समाज को मंदिर की देखरेख का दायित्व दिया था। मंदिर निर्माण कब और किसने कराया। इसके प्रमाण या साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। पूर्व में शिव मंदिर एक गोल मठिया के रूप में छोटा मंदिर था।
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गोला गोकर्णनाथ
- फोटो : अमर उजाला
गोकर्ण तीर्थ का भी है विशेष महात्म्य
पद्म पुराण में ब्राह्मण सदानंद द्वारा पंच तीर्थों की स्थापना और महात्म्य का वर्णन मिलता है। इनमें पहला गोकर्ण तीर्थ प्राचीन शिव मंदिर के समीप, दूसरा कोणार्क तीर्थ भवानीगंज ग्राम में, तीसरा पोनाग्र तीर्थ पुनर्भूग्रंट गांव में, चौथा भद्र तीर्थ नगर के सिनेमा मार्ग के समीप, पांचवां अहमदनगर ग्राम में माण्ड ऋषि की तपस्थली में माण्ड तीर्थ के नाम से विख्यात है।