'इश्क कभी नहीं मरता वादियाें बहता है दास्तान बनकर' अाप ने हीर रांझा, शीरी फराद की ताे कहानियां सुनी हाेंगी पर एक एेसा प्रेमी जाेड़ा भी था जिसे इश्क करने वाले भगवान की तरह पूजते हैं। उसकी समाधि पर अपना सिर झुका कर ताउम्र प्रेमी युगल एक दूसरे का साथ निभाने की कसमें खाते हैं। मकर संक्रांति के दिन यहां पर माेहब्बत करने वालाें मेला लगता है।
नटबली मंदिर इश्क करने वालाें का तीर्थस्थान है
भूरागढ़ दुर्ग और केन नदी के मध्य स्थित नटबली मंदिर इश्क करने वालाें का तीर्थस्थान है। मकर संक्रांति के दिन यहां अाशिकाें का मेला लगता है। मेले में प्रेमी जाेड़े अाते हैं अाैर जिंदगीभर एक दूसरे का साथ निभाने की कसमें खाते हैं। इसे आशिकों का मेला भी कहा जाता है।
यहां 167 सालाें से नटबली मंदिर में मेला लगने की प्रथा
यहां 167 सालाें से नटबली मंदिर में मेला लगने की प्रथा चली अा रही है। महोबा के सुगिरा का रहने वाला नोने अर्जुन सिंह भूरागढ़ दुर्ग का किलेदार था। यहां से कुछ किलोमीटर दूर सरबई (मध्य प्रदेश) गांव है। वहां नट जाति के लोग आबाद थे। अक्सर करतब दिखाने और कामकाज के लिए नट भूरागढ़ आते थे।
सूत की रस्सी पर चलकर नदी पार कर किले में आए
किले में काम करने वाले एक युवा नट से किलेदार की बेटी को प्यार हो गया। नोने अर्जुन सिंह को इसका पता चला तो उसने प्रेमी युवा नट से यह शर्त रख दी कि सूत की रस्सी पर चलकर नदी पार कर किले में आए। अगर ऐसा कर लेगा तो वह अपनी बेटी से उसकी शादी कर देगा।
यह जगह प्रेमियाें के लिए तीर्थस्थान बन गई
नट ने शर्त मान ली। जब वाे सूत की रस्सी पर नदी पार कर के अा रहा था ताे किलेदार ने कैंची से रस्सी काे काट दिया। जिससे नट की माैत हाे गई। यह देख नट की प्रेमिका ने भी किले से कूद कर अपनी जान दे दी। तब से यह जगह प्रेमियाें के लिए तीर्थस्थान बन गई।