शिवपाल यादव की समाजवादी पार्टी और भतीजे अखिलेश यादव से लंबे समय से तानातानी चल रही है। यही वजह रही जाे शिवपाल यादव ने सालों की मेहनत के बाद भाई मुलायम सिंह यादव के साथ खड़ी की समाजवादी पार्टी का दामन छाेड़ खुद की पार्टी बनाई। यूपी के सीटों पर प्रसपा से प्रत्याशी भी उतारे पर अचानक से शिवपाल का परिवार प्रेम फिर से जाग गया है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि शिवपाल भविष्य की फील्डिंग सजा रहे हैं।
चुनावी पिच पर शिवपाल ने सजाई भविष्य की फील्डिंग, तमाम फसादों के बाद जागा परिवार का मोह
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चुनावी समर में कन्नौज से सपा उम्मीदवार और मौजूदा सांसद डिंपल यादव के मुकाबले प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (प्रसपा) ने घोषित प्रत्याशी सुनील सिंह राठौर को मैदान में न उतारकर राजनीतिक हलकों में बड़ा सवाल छोड़ दिया है। कोई इसे पारिवारिक लगाव के संदेश के रूप में ले रहा है तो कोई गठबंधन की राजनीति में आने वाले दिनों की गुंजाइश के संकेत बता रहा है।
वजह जो भी हो लेकिन राजनीति के रणनीतिकार यह मान रहे हैं कि सियासत के मंझे हुए खिलाड़ी शिवपाल यादव ने चुनावी पिच पर भविष्य की दूरगामी सोच से फील्डिंग सजाई है। प्रसपा मुखिया के मैनपुरी के चुनावी मैदान में सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव के सामने प्रत्याशी नहीं उतारने को भले सियासतदां भाई के प्रति उनकी श्रद्धा और प्रेम के रूप में ले रहे थे।
कन्नौज सीट से डिंपल के मुकाबले तय प्रत्याशी को अंतिम समय में चुनावी समर से अलग कर शिवपाल ने सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया। यही नहीं बदायूं संसदीय सीट पर सपा प्रत्याशी एवं सांसद धर्मेंद्र यादव के खिलाफ भी प्रसपा प्रत्याशी चुनाव मैदान में नहीं है। आजमगढ़ में छठवें चरण में 12 मई को होने वाले मतदान के लिए 16 अप्रैल से नामांकन शुरू होना है।
परिपक्व सियासी समझ वाले लोग अब तक की सियासी स्थितियों के आधार पर मान रहे हैं कि आजमगढ़ से भी प्रसपा उम्मीदवार चुनाव मैदान में नहीं होगा। मैनपुरी, कन्नौज, बदायूं और आजमगढ़ सीटें ऐसी हैं, जहां समाजवादी पार्टी मजबूत स्थिति में रही है। वोट बैंक भी मजबूत है। इन सीटों पर शिवपाल सिंह यादव की पार्टी कुछ खास भले न करे लेकिन सपा के कैडर वोट को जरूर प्रभावित कर सकती है।