कानपुर के डॉ. रवि कुमार ने बताया कि सोशल मीडिया, मोबाइल फोन एडिक्शन से सबसे ज्यादा तलाक के मामले बढ़े हैं। इसे ऑब्सट्रकटिव कम्पल्सिव डिस्आर्डर (ओसीडी) में शामिल किया है। पिछले 10 सालों में यह एडिक्शन बढ़ा है। ओसीडी के 100 मामलों में मोबाइल एडिक्शन के 10 फीसदी मामले होते हैं। इससे मस्तिष्क में सेरोटोनिन नामक न्यूरो केमिकल कम हो जाता है। रोगियों में एंजाइटी और डिप्रेशन बढ़ जाता है।
इससे जुड़े कुछ ऐसे मामले सामने आए हैं जो आपको हैरान कर देंगे...
कानपुरः केस-एक: महिला की फेसबुक पर एक पुरुष से दोस्ती हो गई। महिला ने उसे कभी देखा नहीं है। लेकिन वह अपने पति से जिद पर अड़ी है कि वह दोनों बच्चों को रख ले, वह उस पुरुष के पास जाएगी। पूरे परिवार के समझाने के बाद भी जब न मानी तो लोग उसे वरिष्ठ मनोरोग विशेषज्ञ डॉ रवि कुमार के यहां ले आए। डॉ. कुमार ने उसका इलाज शुरू किया।
केस- दो: एक छात्र को अब नींद नहीं आती। मोबाइल फोन पर सोशल मीडिया में सर्फिंग किए बिना उसे बेचैनी रहती है। खाना कम हो गया है। व्यावहार में बदलाव आ गया है। परीक्षा में अंक बहुत कम आए हैं। मिजाज में चिड़चिड़ापन और गुस्सा जल्दी आता है। उसे आवाजें सुनाई पड़ती हैं। घरवाले उसे मनोरोग विशेषज्ञ के पास लाए तो इलाज शुरू हो गया।
सोशल मीडिया और मोबाइल फोन एडिक्शन के ये दो मामले तो बानगी भर हैं। रात-दिन मोबाइल पर चिपके रहने से स्थिति और बिगड़ी गई है। सेहत के नुकसान के साथ ही इससे पारिवारिक कलह और तलाक के मामले बढ़ गए हैं। इन हालातों के मद्देनजर इंडियन साइकिएट्रिक सोसाइटी ने नई गाइडलाइन जारी की है।
सोसाइटी के सेंट्रल जोन अध्यक्ष वरिष्ठ मनोरोग विशेषज्ञ डॉ.रवि कुमार का कहना है कि गाइडलाइन में टीवी देखने, मोबाइल फोन पर सर्फिंग करने के अधिकतम दो घंटे निश्चित कर दिए गए हैं। इससे अधिक समय सोशल मीडिया को देना नुकसानदेह है।