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Bdy Spcl: कन्हैयापुर से कन्हापुर फिर कम्पू और अब कानपुर में बदल गया यह शहर
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर
Updated Sat, 24 Mar 2018 12:20 PM IST
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बड़ा दमदार है शहर कानपुर। सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में उसने एक बार तो अंग्रेजों को एकदम बेदम कर मार ही भगाया था। यह बात अलग है कि अंग्रेजों के पलटवार में उसको शिकस्त खानी पड़ी। तथापि कालांतर में अंग्रेजी हुकूमत से मोर्चा लेने वाले क्रांतिकारियों का गढ़ रहा कानपुर।
मेस्कर घाट कानपुर
कानपुर के इतिहास को लेकर विद्वानों में खुपड़िहाव खूब हुआ है और मगजमारी भी। कुछ विद्वानों ने माना कि कानपुर की नींव सन् 1750 में सचेंडी के राजा हिंदू सिंह ने डाली थी, जबकि कुछ का मत है कि आधुनिक कानपुर के उद्भव और विकास की रेखा सन् 1778 से देखी जानी चाहिए, जब अंग्रेजों ने यहां छावनी बनाई। शहर के विष्णु त्रिपाठी कानपुर का अांखाें देखी इतिहास बताते हैं।
लाल इमली कानपुर
कानपुर के इतिहास के अनुसंधित्सु दिवंगत डॉ. मुनीश्वर निगम के अनुसार, कानपुर सर्वप्रथम सत्रहवीं शताब्दी के अंत में सन् 1698 के आसपास एक गांव के रूप में अस्तित्व में आया। ज्योरा खेड़ा (अब ज्योरा ख्योरा) में कानपुर की नींव रखी सचेंडी के राजा हिंदू सिंह ने, जो जाजमऊ से उधर गंगा नहाने गए थे। दिन कन्हैया अष्टमी का था, इसीलिए गांव का नाम रखा गया कन्हैयापुर, जो बाद में कान्हपुर, कम्पू, कानपुर बदलता गया।
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कानपुर सेंट्रल
पहले-पहल केवल गांव की शक्ल में बसकर शहर कानपुर अपनी जीवन यात्रा के 300 से अधिक वर्ष पूरे कर चुका है। सन् 1765 में नवाब शुजाउद्दौला को शिकस्त देकर जाजमऊ संधि के तहत दस साल बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपना कैंप बिलग्राम, हरदोई से हटाकर यहां लगाया। इसके बाद से ही यहां को अहम केंद्र माना जाने लगा था।
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कानपुर में दिन पर दिन खड़ी हाेती इमारतें
फौजी छावनी का मुकम्मल बंदोबस्त होते देख रोजी-रोजगार का हिल्ला बनाने की लालसा में हुनरमंद दस्तकारों और सयाने सौदागरों का यहां तांता लग गया। महत्व के साथ-साथ इस जगह का दायरा भी बढ़ने लगा और सन् 1801 में यह जगह जिले के रूप में अस्तित्व में आने लगी, लेकिन इसको औपचारिक रूप से जिला 24 मार्च 1803 को घोषित किया गया। इसके बाद तो कानपुर ने एक से बढ़कर एक क्रांतियां कीं, वह चाहे आजादी के लिए हो या उद्योग के क्षेत्र में।